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उत्तराखंड चुनावी सरगर्मी के मौसम में नेताओं की दौड़भाग शुरू, जनता भी पूछने लगी हिसाब-किताब!

Lokesh Badoni
Last updated: October 29, 2026 2:21 am
Lokesh Badoni Published October 29, 2026
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Contents
पुरोला उतरकाशी।   उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सियासी हलचल तेज होने लगी है। नेताओं की बैठकों, जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों ने राजनीतिक माहौल को गर्माना शुरू कर दिया है कभी जनता अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती थी, लेकिन अब चुनाव नजदीक आते ही नेता खुद जनता की चौखट पर पहुंचने लगे हैं। गांवों की पगडंडियों से लेकर बाजारों की चौपालों तक जनसंपर्क का दौर शुरू हो गया है।पांच साल की याददाश्त या पांच महीने का जनप्रेम? चुनावी मौसम में नेताओं के कदम गांवों की ओर बढ़ रहे हैं। कोई विकास कार्यों का ब्यौरा दे रहा है, तो कोई नई उम्मीदों के साथ जनता के बीच पहुंच रहा है। जनता भी मन ही मन सवाल तैयार कर रही है—साहब! चुनाव के समय तो आप हमारे द्वार आ गए, लेकिन जब हमें जरूरत थी, तब आप कहां थे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे पहाड़ की जनता के लिए आज भी अहम हैं। मतदाता केवल वादे नहीं, बल्कि धरातल पर हुए कामों का हिसाब भी चाहते हैं।अब गांवों में भी राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज होने लगा है। कहीं पुराने कामों की तारीफ हो रही है, तो कहीं अधूरे वादों पर सवाल उठ रहे हैं। चुनावी माहौल में नेताओं के लिए जनता से संवाद जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जनता के सवालों का जवाब देना भी है।

पुरोला उतरकाशी।

   उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ सियासी हलचल तेज होने लगी है। नेताओं की बैठकों, जनसंपर्क और संगठनात्मक गतिविधियों ने राजनीतिक माहौल को गर्माना शुरू कर दिया है कभी जनता अपने काम के लिए नेताओं के दरवाजे खटखटाती थी, लेकिन अब चुनाव नजदीक आते ही नेता खुद जनता की चौखट पर पहुंचने लगे हैं। गांवों की पगडंडियों से लेकर बाजारों की चौपालों तक जनसंपर्क का दौर शुरू हो गया है।पांच साल की याददाश्त या पांच महीने का जनप्रेम?
चुनावी मौसम में नेताओं के कदम गांवों की ओर बढ़ रहे हैं। कोई विकास कार्यों का ब्यौरा दे रहा है, तो कोई नई उम्मीदों के साथ जनता के बीच पहुंच रहा है। जनता भी मन ही मन सवाल तैयार कर रही है—साहब! चुनाव के समय तो आप हमारे द्वार आ गए, लेकिन जब हमें जरूरत थी, तब आप कहां थे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दे पहाड़ की जनता के लिए आज भी अहम हैं। मतदाता केवल वादे नहीं, बल्कि धरातल पर हुए कामों का हिसाब भी चाहते हैं।अब गांवों में भी राजनीतिक चर्चाओं का दौर तेज होने लगा है। कहीं पुराने कामों की तारीफ हो रही है, तो कहीं अधूरे वादों पर सवाल उठ रहे हैं। चुनावी माहौल में नेताओं के लिए जनता से संवाद जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी जनता के सवालों का जवाब देना भी है।

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