आचार्य लोकेश बडोनी मधुर
पुरोला उतरकाशी
करवा चौथ हिंदू धर्म का एक प्रमुख पर्व है, जो दांपत्य प्रेम, आस्था, समर्पण और पारिवारिक सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। करवा चौथ का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा से भी जुड़ा हुआ है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा करती हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।
करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। आपकों बताते चलें कि करवा चौथ की शुरुआत कब हुई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें रानी वीरावती की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लोकमान्यता के अनुसार, वीरावती ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। कथा में उनके व्रत, श्रद्धा और कठिन परिस्थितियों के बीच अटूट विश्वास का वर्णन मिलता है। आचार्य सन्तोष खण्डूरी ने बताया कि महाभारत से जुड़ी परंपराओं में भी द्रौपदी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन प्राप्त करने और अर्जुन की कुशलता के लिए व्रत करने की कथा का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति में दांपत्य प्रेम, निष्ठा और प्रार्थना के महत्व को समझाया जाता है ,करवा चौथ के दिन महिलाएं परंपरानुसार सुबह सरगी ग्रहण करती हैं। इसके बाद अपनी मान्यता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखती हैं। दिन में पूजा की तैयारियां की जाती हैं तथा शाम को महिलाएं पारंपरिक वस्त्र धारण कर पूजा की थाली सजाती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं।
चंद्रोदय के समय चंद्रदेव को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोला जाता है। कई स्थानों पर छलनी से चंद्रमा और फिर पति के दर्शन करने की परंपरा भी प्रचलित है।
करवा चौथ भारतीय संस्कृति की उन परंपराओं में शामिल है, जो परिवार और रिश्तों के महत्व को रेखांकित करती हैं। बदलते समय के साथ अब कुछ पति भी अपनी पत्नी के स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करते हुए व्रत रखते हैं। इससे यह पर्व आपसी सहयोग, समान सम्मान और प्रेम की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। आपको बताते चलें कि कि करवा चौथ का पर्व परंपरागत रूप से पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से जुड़ा है, लेकिन आधुनिक समय में इस पर्व का स्वरूप भी बदलता नजर आ रहा है। व्रत और पूजा-पाठ के साथ बाजारों में खरीदारी, महंगे कपड़े, आभूषण, सौंदर्य प्रसाधन और उपहारों का आकर्षण बढ़ा है। कई महिलाओं के लिए करवा चौथ अब धार्मिक आस्था के साथ सजने-संवरने और खरीदारी का अवसर भी बन गया है। हालांकि, आज भी अनेक महिलाएं इस पर्व को पूरी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाती हैं। बदलते समय में जरूरत इस बात की है कि पर्व की मूल भावना, प्रेम, विश्वास और आपसी सम्मान को दिखावे से ऊपर रखा जाए।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत माता पार्वती और भगवान शिव के प्रति श्रद्धा से भी जुड़ा हुआ है। इस दिन महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा करती हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।
करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। आपकों बताते चलें कि करवा चौथ की शुरुआत कब हुई, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें रानी वीरावती की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लोकमान्यता के अनुसार, वीरावती ने अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। कथा में उनके व्रत, श्रद्धा और कठिन परिस्थितियों के बीच अटूट विश्वास का वर्णन मिलता है। आचार्य सन्तोष खण्डूरी ने बताया कि महाभारत से जुड़ी परंपराओं में भी द्रौपदी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन प्राप्त करने और अर्जुन की कुशलता के लिए व्रत करने की कथा का उल्लेख मिलता है। इन कथाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृति में दांपत्य प्रेम, निष्ठा और प्रार्थना के महत्व को समझाया जाता है ,करवा चौथ के दिन महिलाएं परंपरानुसार सुबह सरगी ग्रहण करती हैं। इसके बाद अपनी मान्यता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखती हैं। दिन में पूजा की तैयारियां की जाती हैं तथा शाम को महिलाएं पारंपरिक वस्त्र धारण कर पूजा की थाली सजाती हैं और करवा चौथ की कथा सुनती हैं।
चंद्रोदय के समय चंद्रदेव को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोला जाता है। कई स्थानों पर छलनी से चंद्रमा और फिर पति के दर्शन करने की परंपरा भी प्रचलित है।
करवा चौथ भारतीय संस्कृति की उन परंपराओं में शामिल है, जो परिवार और रिश्तों के महत्व को रेखांकित करती हैं। बदलते समय के साथ अब कुछ पति भी अपनी पत्नी के स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करते हुए व्रत रखते हैं। इससे यह पर्व आपसी सहयोग, समान सम्मान और प्रेम की भावना को भी प्रोत्साहित करता है। आपको बताते चलें कि कि करवा चौथ का पर्व परंपरागत रूप से पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना से जुड़ा है, लेकिन आधुनिक समय में इस पर्व का स्वरूप भी बदलता नजर आ रहा है। व्रत और पूजा-पाठ के साथ बाजारों में खरीदारी, महंगे कपड़े, आभूषण, सौंदर्य प्रसाधन और उपहारों का आकर्षण बढ़ा है। कई महिलाओं के लिए करवा चौथ अब धार्मिक आस्था के साथ सजने-संवरने और खरीदारी का अवसर भी बन गया है। हालांकि, आज भी अनेक महिलाएं इस पर्व को पूरी श्रद्धा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाती हैं। बदलते समय में जरूरत इस बात की है कि पर्व की मूल भावना, प्रेम, विश्वास और आपसी सम्मान को दिखावे से ऊपर रखा जाए।
