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सनातन धर्म संस्कृति परंपराओं में शुभ कार्य या निर्माण की शुरुआत होती है भूमि पूजन से न कि गड्डा पूजन से।

Lokesh Badoni
Last updated: July 6, 2026 9:05 pm
Lokesh Badoni Published July 6, 2026
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सम्पादकीय

किसी भी शुभ कार्य प्रारंभ करने से पहले वैदिक सनातन धर्म संस्कृति परंपरा में श्री गणेश व स्थानीय इष्ट देवी देवताओं का स्मरण पूजन आदि करने से जैसे नए निर्माण या घर की नींव रखने से पहले भूमि पूजन इसलिए जरूरी होता है क्योंकि यह भूमि को शुद्ध करता है, नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और धरती माता (भूमि देवी) व वास्तु पुरुष से आशीर्वाद प्राप्त करता है ताकि बिना किसी बाधा के निर्माण कार्य पूरा हो सके ।
भूमि पूजन या निर्माण कार्य शुरू करने से पहले जमीन की खुदाई और निर्माण के दौरान जमीन के भीतर रहने वाले जीवों को अनजाने में होने वाले नुकसान के लिए पृथ्वी माता से क्षमा मांगी जाती है क्योंकि निर्माण कार्य के दौरान मजदूरों की सुरक्षा और काम में बिना किसी देरी या दुर्घटना के पूरा होने की और जमीन की खुदाई और निर्माण के दौरान जमीन के भीतर रहने वाले जीवों को अनजाने में होने वाले नुकसान के लिए पृथ्वी माता से क्षमा मांगी जाती है यह पूजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शुभ कार्य के प्रति सम्मान, आस्था और भारतीय संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। यह हमारी परंपरा और सामाजिक विरासत का हिस्सा है। किसी भी विकास कार्य का शुभारंभ भूमि पूजन से करना अनेक लोगों के लिए सांस्कृतिक आस्था का विषय है। लेकिन दुर्भाग्य है जब विकास कार्यों पर तथ्यपरक चर्चा करने के बजाय प्रतीकात्मक घटनाओं को राजनीतिक विवाद का माध्यम बनाया जाता है। यदि किसी सड़क, पुल या अन्य परियोजना में देरी, गुणवत्ता या प्रक्रिया को लेकर प्रश्न हैं, तो उनका समाधान संबंधित विभाग, और प्रशासन से तथ्यों के आधार पर पूछा जाना चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही आवश्यक है, लेकिन उसके लिए प्रमाण, तर्क और जिम्मेदार संवाद भी उतना ही आवश्यक है।
यदि किसी को आपत्ति है, तो उसे तथ्यों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। केवल शोर मचाना, कटाक्ष करना या लोगों को भ्रमित करना जनहित की राजनीति नहीं कहलाती।

जो लोग केवल अपने राजनीति व निजी हित पूरे न होने पर विकास कार्यों का विरोध करने लगते हैं, उन्हें भी आत्ममंथन करना चाहिए। जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन उसके कार्यों, नीतियों और जनता के प्रति उत्तरदायित्व के आधार पर होना चाहिए, न कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर।
लोकतंत्र में स्वस्थ आलोचना का स्वागत होना चाहिए, लेकिन वह तथ्य, मर्यादा और जनहित पर आधारित हो। आइए, विकास की गति को राजनीति का शिकार बनाने के बजाय समाज और राष्ट्र  हित में सकारात्मक संवाद को आगे बढ़ाएँ।

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