पुरोला उतरकाशी
भारतीय सनातन संस्कृति में धनतेरस और दीपावली का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व है। दीपावली के पांच दिवसीय उत्सव का शुभारंभ धनतेरस से होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला यह पर्व धन, आरोग्य, सुख-समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद एवं आरोग्य का देवता माना जाता है। इसलिए धनतेरस पर उनकी पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की जाती है। इस दिन दीपदान की भी विशेष परंपरा है, राज्यमंत्री गीताराम गौड़ ने कहा दीपावली का पर्व अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था। तभी से दीपोत्सव की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।धनतेरस और दीपावली केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने वाले पर्व भी हैं। इन अवसरों पर लोग घरों की साफ-सफाई, सजावट, रंगोली और दीप प्रज्वलित करते हैं। परिवार, रिश्तेदार और मित्र एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं तथा मिठाइयों का आदान-प्रदान कर आपसी प्रेम और सद्भाव बढ़ाते हैं। दीपावली स्थानीय कारीगरों, कुम्हारों, व्यापारियों, मिठाई विक्रेताओं और छोटे कारोबारियों के लिए भी आर्थिक गतिविधियों का अवसर लेकर आती है धनतेरस हमें सिखाती है कि जीवन में धन के साथ स्वास्थ्य भी जरूरी है, वहीं दीपावली हमें अपने जीवन से अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता दूर कर प्रेम, सेवा, सद्भाव और मानवता का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद एवं आरोग्य का देवता माना जाता है। इसलिए धनतेरस पर उनकी पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना की जाती है। इस दिन दीपदान की भी विशेष परंपरा है, राज्यमंत्री गीताराम गौड़ ने कहा दीपावली का पर्व अंधकार पर प्रकाश, अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा कर माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उत्सव मनाया था। तभी से दीपोत्सव की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।धनतेरस और दीपावली केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने वाले पर्व भी हैं। इन अवसरों पर लोग घरों की साफ-सफाई, सजावट, रंगोली और दीप प्रज्वलित करते हैं। परिवार, रिश्तेदार और मित्र एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं तथा मिठाइयों का आदान-प्रदान कर आपसी प्रेम और सद्भाव बढ़ाते हैं। दीपावली स्थानीय कारीगरों, कुम्हारों, व्यापारियों, मिठाई विक्रेताओं और छोटे कारोबारियों के लिए भी आर्थिक गतिविधियों का अवसर लेकर आती है धनतेरस हमें सिखाती है कि जीवन में धन के साथ स्वास्थ्य भी जरूरी है, वहीं दीपावली हमें अपने जीवन से अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता दूर कर प्रेम, सेवा, सद्भाव और मानवता का प्रकाश फैलाने की प्रेरणा देती है।
