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दिल्ली

डिजिटल युग में उत्तरदायी धार्मिक शिक्षा का महत्व

Lokesh Badoni
Last updated: August 25, 2026 8:08 am
Lokesh Badoni Published August 25, 2026
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कुछ दशक पहले यदि लखनऊ, हैदराबाद या कोझिकोड का कोई युवा मुसलमान वुज़ू (वज़ू) से संबंधित कोई प्रश्न पूछना चाहता, क़ुरआन की किसी आयत का अर्थ समझना चाहता या किसी नए वित्तीय उत्पाद पर शरीअत का फ़तवा जानना चाहता, तो उसका मार्ग लगभग निश्चित होता था। वह अपने स्थानीय इमाम, मदरसे के किसी शिक्षक या परिवार के ऐसे बुज़ुर्ग के पास जाता, जिन्हें धार्मिक ज्ञान और इस्लामी ग्रंथों की अच्छी समझ होती थी। उस ज्ञान के साथ विष्वास की एक पूरी श्रृंखला जुड़ी होती थी। व्यक्ति जानता था कि उसे पढ़ाने वाला कौन है, उसने कहाँ से शिक्षा प्राप्त की है, और यदि किसी बात पर संदेह हो, तो वह तुरंत प्रश्न पूछकर उसका स्पष्टीकरण प्राप्त कर सकता था। आज वही प्रश्न, चाहे वुज़ू से संबंधित हो या क़ुरआन की तफ़्सीर से, अधिकतर लोग इंटरनेट के सर्च इंजन, किसी चैटबॉट या सोशल मीडिया पर स्वतः चलने वाली पहली रील के माध्यम से पूछते और उसका उत्तर प्राप्त करते हैं।
इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक या यूट्यूब पर कुछ ही मिनटों में किसी युवा को एक ही विषय पर पाँच अलग-अलग व्यक्तियों की पाँच भिन्न राय सुनने को मिल सकती है। वे सभी पूरे आत्मविष्वास के साथ बोलते हैं, जबकि न तो श्रोता उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानता है और न ही उनके ज्ञान या योग्यता की सत्यता की पुष्टि कर सकता है। यह परिवर्तन पहली नज़र में सुविधाजनक और सशक्त बनाने वाला प्रतीत होता है, किंतु इसके साथ अनेक ऐसे जोखिम भी जुड़े हैं जिन पर भारतीय मुस्लिम परिवारों, विद्यार्थियों, युवाओं और पूरे समुदाय को गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि डिजिटल माध्यमों ने ज्ञान के नए द्वार खोले हैं। किसी छोटे कस्बे का दैनिक मज़दूर, जिसे पहले प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों तक पहुँच प्राप्त नहीं थी, अब दारुल उलूम देवबंद, नदवतुल उलेमा (नदवा) या अल-अज़हर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्वानों के व्याख्यान अपनी भाषा में, वह भी निःशुल्क सुन सकता है। जिन महिलाओं के लिए प्रत्यक्ष धार्मिक सभाओं में भाग लेना कठिन था, वे अब योग्य महिला इस्लामी विद्वानों से ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं। विदेशों में रहने वाले भारतीय मुसलमान और दूर-दराज़ के शहरों में अध्ययनरत विद्यार्थी भी अब इस्लामी शिक्षा से पहले की तुलना में कहीं अधिक जुड़े रह सकते हैं। किन्तु यही खुलापन, जो किसी प्रामाणिक विद्वान को व्यापक श्रोताओं तक पहुँचने का अवसर देता है, उसी प्रकार ऐसे लोगों को भी मंच प्रदान करता है जिनके पास न तो धार्मिक प्रशिक्षण है, न कोई जवाबदेही और कभी-कभी तो इस्लाम की वास्तविक समझ भी नहीं होती। उनका उद्देश्य केवल अधिक से अधिक दर्शक और लोकप्रियता प्राप्त करना होता है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस बात में भेद नहीं करते कि किसी व्यक्ति ने पंद्रह वर्ष मान्यता प्राप्त विद्वानों से शिक्षा प्राप्त की है या उसने केवल कुछ अनूदित हदीसें पढ़कर अपना चैनल प्रारंभ कर दिया है। उपयोगकर्ता की स्क्रीन पर वही सामग्री अधिक दिखाई जाती है जो भावनात्मक, विवादास्पद या अत्यधिक आत्मविष्वास के साथ प्रस्तुत की गई हो, न कि वह जो सबसे अधिक प्रामाणिक और संतुलित हो।
ऑनलाइन धार्मिक सामग्री का एक गंभीर खतरा यह भी है कि वह अक्सर गुमनामी या उधार लिए गए अधिकार के पीछे छिपी होती है। कोई व्यक्ति विद्वानों जैसा नाम रख सकता है, कैमरे के सामने धार्मिक पोशाक या पगड़ी पहन सकता है अथवा इतनी दृढ़ता से बोल सकता है कि दर्शक उसे स्वतः विद्वान मान लें। पारंपरिक इस्लामी शिक्षा में किसी शिक्षक की विश्वसनीयता उसकी शिक्षा-श्रृंखला, उसके गुरुओं, उसके द्वारा पढ़े गए ग्रंथों तथा वरिष्ठ विद्वानों की मान्यता पर आधारित होती थी। ऑनलाइन संसार में यह पूरी श्रृंखला या तो दिखाई नहीं देती या कई बार पूरी तरह काल्पनिक होती है। इसलिए किसी भी धार्मिक मत या फ़तवे पर विश्वास करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि वह व्यक्ति वास्तव में कौन है, उसने कहाँ से शिक्षा प्राप्त की है और क्या उसके ज्ञान की पुष्टि स्वतंत्र रूप से की जा सकती है। यदि इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर उपलब्ध न हो, तो सावधानी बरतना ही उचित है, चाहे उसकी प्रस्तुति कितनी भी आकर्षक क्यों न हो। यह प्रत्येक ऑनलाइन वक्ता पर संदेह करने की बात नहीं है, बल्कि धार्मिक ज्ञान के प्रति वही सावधानी अपनाने की आवश्यकता है जो लोग चिकित्सकीय या कानूनी सलाह लेते समय अपनाते हैं। जैसे कोई समझदार व्यक्ति किसी अनजान सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर अपने स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेता, वैसे ही धार्मिक मामलों में भी बिना सत्यापन के किसी राय को स्वीकार नहीं करना चाहिए। इस डिजिटल वातावरण में उत्तरदायी धार्मिक अध्ययन का अर्थ है, हर महत्वपूर्ण दावे की पुष्टि करने की आदत विकसित करना। यदि किसी शरीअत के मसले, हदीस या ऐतिहासिक घटना के बारे में कोई नई या असामान्य बात सुनाई दे, तो यह देखना चाहिए कि क्या प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वानों या मान्यता प्राप्त संस्थानों ने भी ऐसा ही मत व्यक्त किया है तथा उद्धृत स्रोत को सही संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है या नहीं। आज अनेक प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थानों और विद्वानों की आधिकारिक ऑनलाइन उपस्थिति उपलब्ध है, जहाँ धार्मिक और सामाजिक विषयों पर
विश्वसनीय मार्गदर्शन प्राप्त किया जा सकता है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि वही डिजिटल माध्यम, जो लाभकारी ज्ञान उपलब्ध कराते हैं, घृणा, सांप्रदायिकता, कट्टरता और उग्रवाद फैलाने वाली सामग्री भी प्रसारित करते हैं। ऐसी सामग्री अक्सर धर्मपरायणता, पीड़ित होने की भावना या धार्मिक कर्तव्य की भाषा में प्रस्तुत की जाती है। धीरे-धीरे यह व्यक्ति के दृष्टिकोण को इतना सीमित कर देती है कि हिंसा या घृणा उसे अन्याय के विरुद्ध उचित प्रतिक्रिया प्रतीत होने लगती है, जबकि वास्तव में वह इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विपरीत होती है। विशेष रूप से वे युवा, जो स्वयं को अकेला, उपेक्षित या निराश महसूस करते हैं, इस प्रकार की सामग्री का सबसे आसान लक्ष्य बन जाते हैं, क्योंकि तीव्र भावनाओं का दुरुपयोग करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
भारत में प्रचलित सभी प्रमुख इस्लामी विचारधाराओं के मुख्यधारा के विद्वानों ने सदैव आतंकवाद, निर्दाेष लोगों की हत्या और पूरे समुदायों को शत्रु घोषित करने जैसी विचारधाराओं का स्पष्ट रूप से विरोध किया है। जो लोग इस्लाम के नाम पर हिंसा या आतंकवाद को उचित ठहराते हैं, वे इस्लाम की शिक्षाओं को विकृत रूप में प्रस्तुत करते हैं। प्रायः उनके उद्देश्यों का संबंध धार्मिक सत्य से अधिक राजनीतिक हितों या व्यक्तिगत शिकायतों से होता है। चाहे घृणा और हिंसा के संदेश धार्मिक शब्दावली में क्यों न प्रस्तुत किए जाएँ, एक जिम्मेदार श्रोता को प्रत्येक अप्रमाणित दावे के प्रति सतर्क रहना चाहिए और ऐसी सामग्री को साझा करने के बजाय संबंधित मंच पर उसकी शिकायत (रिपोर्ट) करनी चाहिए। यही सावधानी सोशल मीडिया पर फैलने वाले दैनिक सांप्रदायिक तनाव से जुड़े संदेशों के संदर्भ में भी आवश्यक है। भ्रामक वीडियो, संपादित चित्र और संदर्भ से काटे गए दृश्य प्रतिदिन ऐसी टिप्पणियों के साथ प्रसारित किए जाते हैं जिनका उद्देश्य अन्य समुदायों के प्रति क्रोध और अविश्वास उत्पन्न करना होता है। ऐसी सामग्री इसलिए तेजी से फैलती है क्योंकि वह लोगों की भावनाओं को पहले भड़काती है और सोचने का अवसर बाद में देती है। किसी भी ऐसी सामग्री को साझा करने से पहले, जो किसी समुदाय के प्रति भय या क्रोध उत्पन्न करती हो, यह विचार करना चाहिए कि उसका स्रोत कितना विश्वसनीय है, उसका संदर्भ सही है या नहीं और क्या उसे साझा करने से समाज में विभाजन और अविश्वास के अतिरिक्त कोई सकारात्मक परिणाम निकलेगा। इस्लाम सदैव सत्य बोलने और अप्रमाणित बातों को आगे न बढ़ाने की शिक्षा देता है।
कट्टरपंथ और सांप्रदायिक घृणा से स्वयं को सुरक्षित रखना आज अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग स्वघोषित ऑनलाइन प्रचारकों के बजाय वास्तविक और प्रमाणित इस्लामी विद्वानों से मार्गदर्शन प्राप्त करने की आदत विकसित करें। किसी भी दावे को स्वीकार करने या आगे भेजने से पहले उसकी पुष्टि करें और उत्तेजना के बजाय समझ की भावना से प्रश्न पूछें।
इस दिशा में परिवार, इमाम, शिक्षक और समुदाय के बुज़ुर्गों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें इस बात से अवगत रहना चाहिए कि युवा किस प्रकार की ऑनलाइन सामग्री देख रहे हैं और ऐसा विश्वासपूर्ण वातावरण बनाना चाहिए कि यदि कोई किशोर या युवा किसी भ्रामक या चिंताजनक सामग्री के संपर्क में आए, तो वह चुपचाप उसके प्रभाव में आने के बजाय अपने परिवार या विश्वसनीय बड़ों से खुलकर चर्चा कर सके।
डिजिटल युग ने इस्लामी ज्ञान तक पहुँच को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और व्यापक बना दिया है। किंतु इसके साथ सत्य और असत्य, प्रामाणिकता और भ्रम, ज्ञान और दुष्प्रचारकृसभी एक ही मंच पर उपलब्ध हैं।
इसलिए प्रत्येक मुसलमान की जिम्मेदारी है कि वह धार्मिक शिक्षा को विवेक, सत्यापन और उत्तरदायित्व के साथ ग्रहण करे। जब हम प्रमाणित विद्वानों से सीखते हैं, हर जानकारी की जाँच करते हैं, भ्रामक और उग्रवादी सामग्री से स्वयं को दूर रखते हैं तथा परिवार और समाज में स्वस्थ संवाद को प्रोत्साहित करते हैं, तभी डिजिटल माध्यम वास्तव में ज्ञान, समझ और आध्यात्मिक विकास का प्रभावी साधन बन सकते हैं।
प्रस्तुतिः- अल्ताफ़ मीर
पीएच.डी., जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली।

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