आचार्य लोकेश बडोनी मधुर
पुरोला उतरकाशी
मैं एक आम वोटर हूं। मुझे हर 6 महीने में वोट डालने नहीं जाना। मुझे 5 साल काम चाहिए।बार-बार चुनाव का मतलब है – नेता फिर से आएगा, फिर से वही वादा करेगा,एक साथ चुनाव होगा तो नेता को पता होगा – अब 5 साल तक जनता हिसाब मांगेगी, प्रचार नहीं चलेगा।मेरा व्यक्तिगत विचार साफ है -एक बार वोट, 5 साल विकास। बार-बार चुनाव, बार-बार बवाल।विभिन्न राजनैतिक पार्टीयों का जब चुनाव आता है तो हमारा सारा संगठन, सारा पैसा, सारा समय सिर्फ चुनाव में लग जाता है। बूथ मजबूत करने का काम रुक जाता है, जनसंपर्क रुक जाता है। अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो कार्यकर्ता को भी राहत मिलेगी। हम 5 साल तक जनता के बीच काम करेंगे, सिर्फ चुनाव के समय झंडा नहीं उठाएंगे।और सबसे बड़ी बात – हमारे विरोधी जो हर 3 महीने में मुफ्त की रेवड़ी बांट कर सरकार बनाना चाहते हैं, उनका खेल खत्म होगा। देश नीतियों पर वोट देगा, लालच पर नहीं।आम चिंतक के नाते मैं कहता हूं – ये सुधार पार्टी के लिए नहीं, राष्ट्र के लिए है। अगर हम उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्य की बात करते हैं तो यहां चुनाव कराना कितना मुश्किल है हम जानते हैं।एक बार चुनाव में टीचर, पटवारी, आशा बहनें, पुलिस – सबको ड्यूटी पर लगा देते हैं। स्कूल बंद, ऑफिस बंद। पहाड़ में तो 2 दिन पहले से ही टीम भेजनी पड़ती है।अगर हर साल चुनाव होगा तो पहाड़ का विकास कब होगा? हमारे यहां तो वैसे ही आचार संहिता में सड़क का काम रुक जाता है।
मेरा पहाड़ी मन कहता है – एक साथ चुनाव हो, एक बार सारे कर्मचारी लगें, और फिर 5 साल तक पहाड़ में सिर्फ काम हो। बार-बार चुनाव पहाड़ के हिसाब से तो बिल्कुल गलत है।
*मेरा व्यक्तिगत विश्लेषण:*
भारत जैसे विकासशील देश में बार-बार चुनाव अरबों का खर्च है। ये पैसा बचना चाहिए।
देश में 1 करोड़ से ज्यादा कर्मचारी चुनाव ड्यूटी में लगते हैं। उनकी उत्पादकता का नुकसान होता है।
बार-बार चुनाव से लोकलुभावन राजनीति बढ़ती है, कड़े सुधार टलते हैं। अगर सारी सरकारें एक साथ गिर गईं तो क्या फिर से चुनाव होगा? इसका संवैधानिक समाधान साफ होना चाहि।राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय मुद्दे न दब जाएं, इसकी गारंटी वोटर की समझदारी पर है। हम सभी आम जन मानस को एक राष्ट्र एक चुनाव का समर्थन करना चाहिए।
मेरा पहाड़ी मन कहता है – एक साथ चुनाव हो, एक बार सारे कर्मचारी लगें, और फिर 5 साल तक पहाड़ में सिर्फ काम हो। बार-बार चुनाव पहाड़ के हिसाब से तो बिल्कुल गलत है।
*मेरा व्यक्तिगत विश्लेषण:*
भारत जैसे विकासशील देश में बार-बार चुनाव अरबों का खर्च है। ये पैसा बचना चाहिए।
देश में 1 करोड़ से ज्यादा कर्मचारी चुनाव ड्यूटी में लगते हैं। उनकी उत्पादकता का नुकसान होता है।
बार-बार चुनाव से लोकलुभावन राजनीति बढ़ती है, कड़े सुधार टलते हैं। अगर सारी सरकारें एक साथ गिर गईं तो क्या फिर से चुनाव होगा? इसका संवैधानिक समाधान साफ होना चाहि।राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में स्थानीय मुद्दे न दब जाएं, इसकी गारंटी वोटर की समझदारी पर है। हम सभी आम जन मानस को एक राष्ट्र एक चुनाव का समर्थन करना चाहिए।
