संसार मे तीन ईश्वर मुख्यतः माने गये है _ब्रह्मा ,विष्णु,और शंकर ब्रह्मा जी सृष्टी की उत्पत्ती करते है,विष्णु जी पालन करते हैं और शिव संहार करते है।अपनी कईं लिलाओं मे शंकर जी ने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए है जिसके कारण हम उन्हें आध्यात्मिक आदर्श के प्रतीक मान सकते हैं ।कोप मे त्रिशूल द्वारा गणेश जी का सर धड से अलग कर देना और फिर दया करके न सिर्फ गज का सिर लगा कर गणाश जी को पुनर्जीवन देना बल्कि देवताओं मे उन्हें प्रथम पूज्य का स्थान प्रदान करना उनके भोलेनाथ नाम को चरितार्थ करता हैं ।जब माता गोरी श्रीराम की परीक्षा लेने सीताजी का वेष धर कर जा रही होती है तब शिवजी उन्हें इस कार्य के लिए मना करते हैं ।पर हठ पूर्वक जब माता गोरी यह कार्य करती हैं तो शिवजी उन्हें त्याग देते हैं ।इसी प्रकार दक्ष प्रजापति की पुत्री सति शिवजी की इच्छा के बगैर यज्ञ मे जाती है और जब वहाँ शिवजी का अपमान होता देखती हैं तो आत्मदाह कर लेती है ।ये दोनों लिलाऐं यह बताती हैं कि शिव भविष्य की होने श अनहोनी को जानते हैं ।साथ मे वे यह भी उदारण प्रस्तुत करते हैं कि हर पत्नी को हर कार्य अपने पति को विश्वास मे लेकर करने ही परिवार का भला होता हैं ।
भगिरथ की तपस्या के कारण सगर पुत्रों और भगिरथ के पूर्वजों के उद्धार के लिए जब माँ गंगा पृथ्वी पर अवतरित होने के पहले जब शिवजी की जटाओं मे जाना चाहती है ताकि उनके अत्यधिक आवेश को कम किया जा सके,शिवजी माँ गंगा के इस आगृह को स्वीकार करके अपने जनहितेषी स्वरुप को बताते हैं ।इसी कारण उन्का गंगाधर नाम पड़ा ।अपने आधे शरीर मे माता पार्वती को स्थान देकर वे महिला सशक्तिकरण को दर्शाते है । इसी कारण शिव का अर्द्धनारिश्वर नाम हुआ । मे वे यह भी बताते हैं कि महिला के बिना पुरुष अपूर्ण हैं और दोनों का समान महत्व हैं ।
समुद्र मंथन के हलाहल विष को पीकर वे सृष्टि के सबसे बडे शुभचिंतक प्रतीत होते हैं ।इसी कारण उनका नीलकण्ठ नाम हुआ ।कामदेव को भस्म करके वे दर्शाते हैं कि वे गृहस्थी हैं पर कामी नहीं ।सिर्फ खाल को ओढना और कैलाश पर निवास करना और दिगम्बर(अर्थात् दिशाऐं हैं जिनके अम्बर या वस्त्र)नाम धारण करना उनके त्यागी होने को दर्शाता हैं ।
दक्ष प्रजापति का वध करके वे बताते हैं कि अपमान का समुचित प्रत्योत्तर देना चाहिए और पुनः जब उसे बकरे का सिर लगाते है और वह ‘बे’ की ध्वनि निकाल कर अपने पापों के लिए क्षमा माँगता हैं तो शिवजी उसे क्षमा करते हैं साथ मे यह वरदान देते हैं कि जब भी उनके सामने बकरे की आवाज निकालेगा तो वे खुश होंगे और भक्तों को आशीष देंगे ।इसी प्रकार शिवजी दुष्टों को भी अपने नाम के साथ जोडकर उन्हें मान देते हैं बशर्ते वे सुधर गये हों ।राम जी के आगृह पर रामेश्वरम् मे स्थापित होते हैं और रामेश्वरम् का अर्थ बताते है राम है जिनके ईश्वर ।भस्मासूर जैसों को मनचाहा वरदान देते हैं ।
अर्थात् शिव सारे जीवन और नैतिक मूल्यों के जीवन्त प्रतीक हैं ।अनेंक मौको पर उन्होंने सृष्टि को बचाया है।कभी_कभी उन्हें सृष्टि का संहारक कहने पर आश्चर्य होता हैं ।लेकिन जब पाप बढता हैं तो वे ताण्डव करते हैं।अर्थात् अति सर्वत्र वर्जयते को प्रतिपादित करते है। हर-हर महादेव