।। एक हाथ दें और दूसरे हाथ ले।।
संसार का व्यवहार प्रायः ऐसा देखा जाता है, कि *”एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले।”* अर्थात जो सुख या दुख आप दूसरों को देते हैं, वही सुख या दुख आपको भी वापस मिलता है।
संसार का व्यवहार प्रायः ऐसा देखा जाता है, कि *”एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले।”* अर्थात जो सुख या दुख आप दूसरों को देते हैं, वही सुख या दुख आपको भी वापस मिलता है।

इसका कारण यही है, कि सभी आत्माएं एक जैसी हैं। सभी का मूल स्वभाव एक जैसा है। और वह है, *”सुख की इच्छा होना तथा दुख की अनिच्छा होना।”* यह प्रत्येक आत्मा का मूल स्वभाव है। *”इसलिए सब लोग सुख प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, और दुख भोगने की अनिच्छा रखते हैं।” “यदि किसी प्रकार से दुख आ भी जाए, तो तत्काल उस दुख से छूटने की इच्छा करते हैं और छूटने का प्रयत्न भी करते हैं।”*
जीवन में जो जो सुख दुख आते हैं, वे दो प्रकार से आते हैं। *”एक तो ईश्वर की व्यवस्था से, और दूसरे मनुष्यों की व्यवस्था से।” “ईश्वर की व्यवस्था में कभी भी अन्याय नहीं होता। परंतु मनुष्यों की व्यवस्था में कहीं न्याय होता है, और बहुत स्थानों पर अन्याय होता है।”*
इस संसार का सबसे बड़ा राजा ईश्वर है। आप और हम सब ईश्वर के बनाए संसार में रहते हैं, और उसी के नियम संविधान कानून हम सब पर लागू भी होते हैं। ईश्वर के बहुत से कानून हैं। जिनमें से एक यह भी है, कि *”यदि आप दूसरों को सुख देंगे, तभी आपको सुख मिलेगा। और यदि आप दूसरों को दुख देंगे, तो आपको भी दुख मिलेगा।” “ईश्वर स्वयं भी इस नियम के अनुसार सबको कर्मों का फल देता है। और समाज के न्यायकारी पक्षपात रहित बुद्धिमान सज्जन लोग भी इसी नियम का पालन करते हैं।”*
समय समय पर कुछ नियम तात्कालिक रूप से भले ही मनुष्यों ने अपने अपने देशों की संसद में बना लिए हों। *”परंतु यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के अनुकूल होते हैं, तो वे सही और सुखदायक होते हैं। यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के विरुद्ध होते हैं, तो गलत एवं दुखदायक होते हैं।” “जब इन गलत नियमों से प्रजा को परेशानी होती है, तब प्रजा विद्रोह करती है। प्रजा के विद्रोह से प्रभावित होकर फिर मनुष्य लोग अपने अपने देश की संसद में उन नियमों में परिवर्तन संशोधन आदि करते हैं।”* सारी बात का सार यह हुआ, कि *”यदि आप ईश्वर के नियमों का पालन करेंगे, तो ही आप सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।”
*”इसलिए ऊपर बताए नियम का पालन करें। “यदि आप सुख चाहते हों, तो दूसरों को सुख ही देवें। किसी को भी दुख तो न ही दें।” सनातन धर्म की जय

इसका कारण यही है, कि सभी आत्माएं एक जैसी हैं। सभी का मूल स्वभाव एक जैसा है। और वह है, *”सुख की इच्छा होना तथा दुख की अनिच्छा होना।”* यह प्रत्येक आत्मा का मूल स्वभाव है। *”इसलिए सब लोग सुख प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, और दुख भोगने की अनिच्छा रखते हैं।” “यदि किसी प्रकार से दुख आ भी जाए, तो तत्काल उस दुख से छूटने की इच्छा करते हैं और छूटने का प्रयत्न भी करते हैं।”*
जीवन में जो जो सुख दुख आते हैं, वे दो प्रकार से आते हैं। *”एक तो ईश्वर की व्यवस्था से, और दूसरे मनुष्यों की व्यवस्था से।” “ईश्वर की व्यवस्था में कभी भी अन्याय नहीं होता। परंतु मनुष्यों की व्यवस्था में कहीं न्याय होता है, और बहुत स्थानों पर अन्याय होता है।”*
इस संसार का सबसे बड़ा राजा ईश्वर है। आप और हम सब ईश्वर के बनाए संसार में रहते हैं, और उसी के नियम संविधान कानून हम सब पर लागू भी होते हैं। ईश्वर के बहुत से कानून हैं। जिनमें से एक यह भी है, कि *”यदि आप दूसरों को सुख देंगे, तभी आपको सुख मिलेगा। और यदि आप दूसरों को दुख देंगे, तो आपको भी दुख मिलेगा।” “ईश्वर स्वयं भी इस नियम के अनुसार सबको कर्मों का फल देता है। और समाज के न्यायकारी पक्षपात रहित बुद्धिमान सज्जन लोग भी इसी नियम का पालन करते हैं।”*
समय समय पर कुछ नियम तात्कालिक रूप से भले ही मनुष्यों ने अपने अपने देशों की संसद में बना लिए हों। *”परंतु यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के अनुकूल होते हैं, तो वे सही और सुखदायक होते हैं। यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के विरुद्ध होते हैं, तो गलत एवं दुखदायक होते हैं।” “जब इन गलत नियमों से प्रजा को परेशानी होती है, तब प्रजा विद्रोह करती है। प्रजा के विद्रोह से प्रभावित होकर फिर मनुष्य लोग अपने अपने देश की संसद में उन नियमों में परिवर्तन संशोधन आदि करते हैं।”* सारी बात का सार यह हुआ, कि *”यदि आप ईश्वर के नियमों का पालन करेंगे, तो ही आप सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।”
*”इसलिए ऊपर बताए नियम का पालन करें। “यदि आप सुख चाहते हों, तो दूसरों को सुख ही देवें। किसी को भी दुख तो न ही दें।” सनातन धर्म की जय
सम्पादक उत्तराखण्ड अब-तक
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।। एक हाथ दें और दूसरे हाथ ले।।
संसार का व्यवहार प्रायः ऐसा देखा जाता है, कि *”एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले।”* अर्थात जो सुख या दुख आप दूसरों को देते हैं, वही सुख या दुख आपको भी वापस मिलता है।इसका कारण यही है, कि सभी आत्माएं एक जैसी हैं। सभी का मूल स्वभाव एक जैसा है। और वह है, *”सुख की इच्छा होना तथा दुख की अनिच्छा होना।”* यह प्रत्येक आत्मा का मूल स्वभाव है। *”इसलिए सब लोग सुख प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, और दुख भोगने की अनिच्छा रखते हैं।” “यदि किसी प्रकार से दुख आ भी जाए, तो तत्काल उस दुख से छूटने की इच्छा करते हैं और छूटने का प्रयत्न भी करते हैं।”*
जीवन में जो जो सुख दुख आते हैं, वे दो प्रकार से आते हैं। *”एक तो ईश्वर की व्यवस्था से, और दूसरे मनुष्यों की व्यवस्था से।” “ईश्वर की व्यवस्था में कभी भी अन्याय नहीं होता। परंतु मनुष्यों की व्यवस्था में कहीं न्याय होता है, और बहुत स्थानों पर अन्याय होता है।”*
इस संसार का सबसे बड़ा राजा ईश्वर है। आप और हम सब ईश्वर के बनाए संसार में रहते हैं, और उसी के नियम संविधान कानून हम सब पर लागू भी होते हैं। ईश्वर के बहुत से कानून हैं। जिनमें से एक यह भी है, कि *”यदि आप दूसरों को सुख देंगे, तभी आपको सुख मिलेगा। और यदि आप दूसरों को दुख देंगे, तो आपको भी दुख मिलेगा।” “ईश्वर स्वयं भी इस नियम के अनुसार सबको कर्मों का फल देता है। और समाज के न्यायकारी पक्षपात रहित बुद्धिमान सज्जन लोग भी इसी नियम का पालन करते हैं।”*
समय समय पर कुछ नियम तात्कालिक रूप से भले ही मनुष्यों ने अपने अपने देशों की संसद में बना लिए हों। *”परंतु यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के अनुकूल होते हैं, तो वे सही और सुखदायक होते हैं। यदि वे नियम ईश्वर के नियमों के विरुद्ध होते हैं, तो गलत एवं दुखदायक होते हैं।” “जब इन गलत नियमों से प्रजा को परेशानी होती है, तब प्रजा विद्रोह करती है। प्रजा के विद्रोह से प्रभावित होकर फिर मनुष्य लोग अपने अपने देश की संसद में उन नियमों में परिवर्तन संशोधन आदि करते हैं।”* सारी बात का सार यह हुआ, कि *”यदि आप ईश्वर के नियमों का पालन करेंगे, तो ही आप सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।”
*”इसलिए ऊपर बताए नियम का पालन करें। “यदि आप सुख चाहते हों, तो दूसरों को सुख ही देवें। किसी को भी दुख तो न ही दें।” सनातन धर्म की जय
