देहरादून। ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए रखने तथा उनका शानदार संकलन वर्षों से करती चली आ रही विश्व प्रसिद्ध ‘रिच’ संस्था द्वारा ” विरासत आर्ट एंड हेरिटेज फेस्टिवल-2026″ का भव्य शुभारंभ मुख्य सचिव आनंद वर्धन द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुआ I
विरासत आर्ट एंड हेरिटेज फेस्टिवल 2026 की पहली संस्कृति संध्या कार्यक्रम का शुभारंभ छोलिया लोक नृत्य के साथ शुरू हुआ। छोलिया उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं डिवीजन और नेपाल के पश्चिमी प्रांत में उत्पन्न एक पारंपरिक लोक नृत्य शैली है।
विरासत 2026 में उत्तराखंड के पारंपरिक छोलिया नृत्य की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में लोकसंस्कृति की एक खास झलक पेश की। चंदन बोहरा के नेतृत्व में नृत्य दल छोलिया डांस ग्रुप के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति के माध्यम से उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपरा को मंच पर उतारा।
लोक कलाकार चंदन बोहरा के नेतृत्व में समूह के सदस्यों ने छोलिया नृत्य की परंपरा को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। इस तरह की प्रस्तुतियाँ न केवल क्षेत्रीय लोककलाओं को पहचान दिलाती हैं, बल्कि इन परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इस प्रस्तुति में जगमोहन आगरी, कृष्ण आर्य, गोधन राम, रमेश राम, देव राम, गोपाल सिंह, पुरव बोरा, दीवान राम, हरीश राम, खीम राम, हरीश राम, दयाल राम, नंदन राम, महेश राम, भुवन कुमार, गंगा धामी, मीनू सुपियाल, तनुजा पाठक और गिरीश कुमार शामिल रहे।
छोलिया नृत्य आज कुमाऊनी और सुदूरपश्चिमी संस्कृतियों का प्रतीक बन गया है। यह मूल रूप से विवाह जुलूस के साथ किया जाने वाला तलवार नृत्य है, लेकिन अब इसे कई शुभ अवसरों पर किया जाता है। यह विशेष रूप से कुमाऊं डिवीजन के अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ जिलों और नेपाल के डोटी, बैतड़ी और धार्चुला जिलों में लोकप्रिय है। इस तलवार नृत्य का इतिहास एक हजार वर्ष से अधिक पुराना है और यह कुमाऊनी और खास लोगों की युद्ध परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इसकी उत्पत्ति कुमाऊं के युद्धप्रिय क्षत्रियों – खासा और कट्यूरी – के समय में हुई थी, जब विवाह तलवारों की नोक पर संपन्न होते थे।
युद्ध संगीत की संगति में, तलवारों से सुसज्जित होकर, वे अपने साथी नर्तकों के साथ नकली लड़ाई करते हुए पूर्ण सामंजस्य में नृत्य करते हैं। त्रिभुजाकार लाल ध्वज लिए निशानेबाज, तलवारें लहराते हुए, चेहरे पर उग्र भाव लिए हुए, युद्ध में जाने वाले योद्धाओं का आभास कराते हैं। नर्तकों में संगीतकार और तलवारबाज शामिल हैं।
विरासत महोत्सव में आज पहले दिन की संध्या बहुत ही शानदार और आकर्षित होने के साथ-साथ भव्यतम नज़र आई I आज की मधुर एवं मनमोहक संध्या काल में पंडित साजन मिश्रा का शास्त्रीय संगीत आकर्षण का केंद्र बना रहा I
विरासत 2026 में बनारस के कलाकारों ने अपनी शास्त्रीय संगीत प्रस्तुति से श्रोताओं को सुरों की खूबसूरत दुनिया से रूबरू कराया। गायन में पद्म भूषण से सम्मानित पंडित साजन मिश्रा अपने सुपुत्र स्वरांश मिश्रा के साथ शामिल हुए। उनके साथ तबले पर अभिषेक मिश्रा और हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा ने संगत की।
प्रस्तुति की शुरुआत राग और रागिनी से हुई। खास बात यह रही कि कलाकारों ने किसी तय रिहर्सल के बजाय मंच पर ही सुरों के साथ अपनी प्रस्तुति को आगे बढ़ाया। शास्त्रीय संगीत की इसी सहजता और तात्कालिक रचनात्मकता ने गायन को खास बनाया। तबले, हारमोनियम और गायन के बीच बेहतरीन तालमेल देखने को मिला, जिसने पूरे माहौल को संगीतमय बना दिया।
पंडित साजन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा के गायन के साथ अभिषेक मिश्रा की तबले पर संगत और पंडित धर्मनाथ मिश्रा के हारमोनियम ने प्रस्तुति को एक खूबसूरत रूप दिया। इस दौरान श्रोताओं को बनारस की समृद्ध शास्त्रीय संगीत परंपरा की झलक देखने और सुनने को मिली।
साजन मिश्रा (पंडित राजन-पंडित साजन मिश्रा भाई), भारतीय शास्त्रीय संगीत के ख्याल शैली के गायक हैं। ख्याल शैली की गायकी बनारस घराने की 300 साल पुरानी शैली मानी जाती है। मिश्रा बंधुओं ने भारत के साथ-साथ विश्व भर में अपनी गायन कला का प्रदर्शन किया है। वे बनारस घराने के भारत के महान गायक हैं। उन्होंने किशोरावस्था में ही अपने संगीत करियर की शुरुआत की थी। अब अपने भाई और साथी के देहांत के बाद, उन्होंने अपने बेटे स्वरणाश के साथ साझेदारी की है।
इससे पहले मिश्रा बंधुओं ने जर्मनी,फ्रांस,अमेरिका,ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड,ऑस्ट्रिया, मस्कट,नीदरलैंड,सोवियत संघ,कतर और सिंगापुर जैसे कई अन्य देशों में प्रस्तुति दी है। उन्होंने ख्याल शैली (ख्याल गायकी के नाम से जानी जाती है), अर्धशास्त्रीय टप्पा और विभिन्न प्रकार के भजनों के लगभग 20 संगीत एल्बम जारी किए हैं। पंडित साजन मिश्रा,दादा बड़े रामदास जी मिश्रा और पिता हनुमान प्रसाद मिश्रा के शिष्य हैं, और शास्त्रीय संगीत में एक प्रतिष्ठित नाम हैं। पंडित जी को 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
उन्हें 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1994-1995 में गंधर्व राष्ट्रीय पुरस्कार और 14 दिसंबर 2012 को 2011-12 के लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय तानसेन सम्मान प्राप्त हुआ।
स्वरांश मिश्रा अपने पिता और चाचा,पद्मभूषण पंडित राजनजी और साजन जी मिश्रा के बाद, 350 साल पुराने बनारस घराने की छठी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय संगीत की एक गहरी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। एक बहुमुखी कलाकार होने के साथ-साथ, वे गीतकार, संगीतकार और एक प्रभावशाली वक्ता भी हैं। उनकी भावपूर्ण धुनें श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती हैं, और पंडित राजन मिश्रा के निधन के बाद, वे अब अपने पिता पंडित साजन मिश्रा के साथ संगत करते हैं। दीप प्रज्वलन के समय मुख्य सचिव आनंद वर्धन के साथ रिच संस्था के संस्थापक/अध्यक्ष आरके सिंह, संयुक्त सचिव विजय श्रीजोशी तथा वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी समीर सिन्हा उपस्थित रहे I
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