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उत्तराखंड

वह योगावतार जो हमारे बीच विचरण करते थे

Lokesh Badoni
Last updated: September 25, 2026 12:28 am
Lokesh Badoni Published September 25, 2026
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भारत दुनिया के सबसे विविधतापूर्ण देशों में से एक है, जहाँ विभिन्न धर्मों, भाषाओं
संस्कृतियों और परंपराओं से जुड़े लोग रहते हैं। यह विविधता सदियों के दौरान विकसित हुई है और विभिन्न समुदायों ने देश के सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन में योगदान दिया है। भारतीय मुसलमान इस इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं। वास्तुकला, साहित्य, व्यापार, शिक्षा, सार्वजनिक प्रशासन और स्वतंत्रता संग्राम सहित अनेक क्षेत्रों में उनके योगदान देखे जा सकते हैं। जैसे-जैसे भारत एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, सवाल केवल यह नहीं है कि भारतीय मुसलमान देश के भविष्य में किस प्रकार शामिल होंगे, बल्कि यह भी है कि वे एक मजबूत, समावेशी और समृद्ध भारत के निर्माण में आगे और किस प्रकार योगदान दे सकते हैं।
साझी नागरिकता की अवधारणा इस जिम्मेदारी को समझने का एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को, चाहे उसका धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र कुछ भी हो, समान अधिकारों के साथ-साथ समान जिम्मेदारियाँ भी प्राप्त हैं। नागरिकता केवल अधिकारों का आनंद लेने तक सीमित नहीं है। इसका अर्थ समाज में सक्रिय भागीदारी करना, दूसरों की सेवा करना और देश की प्रगति में योगदान देना भी है। भारतीय मुसलमानों के लिए इसका अर्थ शिक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक सेवा, सार्वजनिक जीवन और सामुदायिक कल्याण के क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाना है।
शिक्षा उन सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है, जहाँ समुदाय योगदान दे सकता है। आज के भारत में बेहतर रोजगार, आर्थिक अवसर और नेतृत्व के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, वैज्ञानिक सोच, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों और तकनीकी कौशल पर अधिक जोर देने से युवाओं को बेहतर भविष्य बनाने में सहायता मिल सकती है। मुस्लिम समुदाय के शिक्षक, शोधकर्ता, विद्वान और पेशेवर भी भारत के बौद्धिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। इसलिए शिक्षा को बढ़ावा देना केवल व्यक्तियों और परिवारों के लिए ही लाभकारी नहीं है, बल्कि इससे पूरे समाज को लाभ होता है।
आर्थिक भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। मुस्लिम उद्यमी, कारीगर, व्यापारी, पेशेवर और श्रमिक देशभर की स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में योगदान देते हैं। उद्यमिता, नई तकनीक, नवाचार और आधुनिक कौशल के लिए अधिक समर्थन मिलने से रोजगार और आर्थिक अवसरों का विस्तार हो सकता है। युवाओं को ऐसे व्यवसाय और उद्यम स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है, जो उनके समुदायों की आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ व्यापक अर्थव्यवस्था में भी योगदान दें। आर्थिक मजबूती लोगों को सार्वजनिक और सामाजिक जीवन में अधिक आत्मविश्वास के साथ भाग लेने में भी सक्षम बनाती है।
सामाजिक सेवा योगदान का एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जरूरतमंद लोगों की सहायता और परोपकार का इस्लामी शिक्षाओं में महत्वपूर्ण स्थान है और अनेक व्यक्ति तथा संगठन पहले से ही शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कल्याण के क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। जब ऐसे प्रयास समुदाय की सीमाओं से आगे बढ़कर सभी जरूरतमंद लोगों तक पहुँचते हैं, तो उनका प्रभाव और अधिक व्यापक हो सकता है। छात्रवृत्तियाँ, स्वास्थ्य कार्यक्रम, कौशल प्रशिक्षण और वंचित परिवारों के लिए सहायता विभिन्न वर्गों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। समाज की सेवा तब और अधिक सार्थक बनती है, जब उसका मार्गदर्शन धार्मिक या सामाजिक भेदों के बजाय करुणा की भावना से होता है।
एक समावेशी भारत के लिए इसके विविध समुदायों के बीच अधिक संवाद और संपर्क भी आवश्यक है। बहुलतावाद का अर्थ केवल अलग-अलग समुदायों का एक-दूसरे के साथ रहना नहीं है। इसका अर्थ एक-दूसरे के साथ संवाद करना, मिलकर काम करना और एक-दूसरे से सीखना भी है। भारतीय मुसलमान लंबे समय से भारत के साझा सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। इस परंपरा को मोहल्लों, विद्यालयों, कार्यस्थलों और नागरिक संस्थानों में संवाद तथा नियमित संपर्क के माध्यम से और मजबूत किया जा सकता है। सामाजिक सद्भाव तब बढ़ता है, जब लोग एक-दूसरे को अलग-अलग समूहों के रूप में देखने के बजाय सह-नागरिक के रूप में देखते हैं।
भारतीय संविधान स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के माध्यम से इस साझी नागरिकता के लिए एक साझा आधार प्रदान करता है। ये मूल्य दैनिक व्यवहार के माध्यम से ही सार्थक बनते हैं। दूसरों की गरिमा का सम्मान करना, कानून का पालन करना, पूर्वाग्रह को अस्वीकार करना और लोकतांत्रिक जीवन में रचनात्मक रूप से भाग लेना सभी नागरिकों की साझा जिम्मेदारियाँ हैं। अन्य सभी समुदायों की तरह भारतीय मुसलमान भी नागरिक गतिविधियों में भाग लेकर, संवाद को प्रोत्साहित करके और युवाओं के बीच जिम्मेदार नागरिकता की भावना विकसित करके लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत कर सकते हैं।
डिजिटल युग ने नागरिकता में एक नया आयाम जोड़ दिया है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों के लिए संवाद करना और सूचनाओं का आदान-प्रदान करना आसान बना दिया है। साथ ही, गलत सूचनाएँ, रूढ़ धारणाएँ और विभाजनकारी सामग्री भी तेजी से ऑनलाइन फैल सकती हैं। इसलिए सोशल मीडिया का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग महत्वपूर्ण है। नागरिकों को किसी सूचना को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए, अपमानजनक या भड़काऊ सामग्री से बचना चाहिए और सम्मानजनक चर्चाओं में भाग लेना चाहिए।
साझी नागरिकता की अवधारणा अंततः एक सरल सिद्धांत पर आधारित हैरू किसी भी समुदाय की प्रगति देश की समग्र प्रगति से निकटता से जुड़ी होती है। भारतीय मुसलमानों की समृद्ध विरासत और भारत के लिए लंबे समय से किए गए योगदान का इतिहास रहा है। शिक्षा, उद्यमिता, महिलाओं की भागीदारी, सामाजिक सेवा, सामुदायिक संबंधों और संवैधानिक मूल्यों पर अधिक ध्यान देकर वे देश के भविष्य में और भी मजबूत योगदान दे सकते हैं।
यह सहभागिता समान नागरिकता की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। समावेशी भारत का निर्माण केवल सरकारों द्वारा नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है, जो यह समझते हों कि उनकी अपनी प्रगति देश की प्रगति से जुड़ी हुई है।
लक्ष्य ऐसा समाज होना चाहिए, जहाँ विविधता का सम्मान हो और प्रत्येक नागरिक को गरिमा, अवसर तथा भारत के साझा भविष्य में योगदान देने का समान और उचित अवसर प्राप्त हो।
प्रस्तुतिः अल्ताफ़ मीर
जामिया मिल्लिया इस्लामिया

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