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दिल्ली

आस्था, भटकाव और नैतिक स्पष्टता की आवश्यकता

Lokesh Badoni
Last updated: May 26, 2026 2:26 am
Lokesh Badoni Published May 26, 2026
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मुंबई के मीरा रोड में हाल ही में हुए चाकू हमले ने समाज की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। इस घटना को विशेष रूप से विचलित करने वाली बात केवल दो निर्दाेष सुरक्षा गार्डों पर की गई क्रूरता ही नहीं है, बल्कि धर्म के कथित दुरुपयोग के माध्यम से इस
कृत्य को उचित ठहराने का प्रयास भी है। रिपोर्टों के अनुसार, हमलावर ने पीड़ितों से उनका धर्म पूछा और उनमें से एक को चाकू मारने से पहले कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया। यह अत्यंत चिंताजनक तथ्य दर्शाता है कि कुछ व्यक्ति, सही समझ और नैतिक आधार के अभाव में, किस प्रकार धर्म को निर्दाेषों के विरुद्ध हथियार बना सकते हैं। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि आरोपी संभवतः ऑनलाइन सामग्री और उग्रवादी विचारधाराओं के प्रभाव से स्वयं कट्टरपंथी बना हो सकता है। जांच के दौरान वैश्विक आतंकवादी विचारधाराओं से जुड़े कुछ संदर्भ मिलने की भी बात सामने आई है। यह स्थिति इस बढ़ती हुई समस्या को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न करती है कि कैसे अकेले व्यक्ति, बिना किसी प्रत्यक्ष संगठनात्मक नियंत्रण के, जहरीले विचारों से प्रभावित होकर हिंसक कृत्य कर सकते हैं।
आज कट्टरपंथीकरण (रेडिकलाइज़ेशन) ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से फैलता है। सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड मंच विकृत धार्मिक व्याख्याओं के प्रसार के शक्तिशाली साधन बन चुके हैं। व्यक्ति धीरे-धीरे ऐसे ‘इको चौंबर्स’ में फँस सकते हैं, जहाँ अतिवादी विचार सामान्य और स्वीकार्य प्रतीत होने लगते हैं। दूसरी ओर, सामाजिक अलगाव, टूटे हुए पारिवारिक संबंध, बेरोज़गारी या पहचान का संकट जैसी परिस्थितियाँ व्यक्ति को अधिक संवेदनशील बना देती हैं। जब ये व्यक्तिगत संघर्ष उग्रवादी विचारों से जुड़ते हैं, तो वे ऐसी मानसिकता पैदा कर सकते हैं जो हिंसा को झूठे रूप में उचित ठहराती है।
यह स्पष्ट रूप से कहना आवश्यक है कि इस्लाम में निर्दाेष लोगों की हत्या का कोई औचित्य नहीं है। इस हमले जैसी घटनाएँ न केवल आपराधिक हैं, बल्कि इस्लामी शिक्षाओं के मूल सिद्धांतों के भी पूर्णतः विरुद्ध हैं। कुरआन कहता हैरू “जिसने किसी निर्दाेष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो समस्त मानवता की हत्या की।” । यह सशक्त संदेश मानव जीवन की पवित्रता को सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है। एक अन्य आयत में आदेश दिया गया हैरू “उस जान को न मारो जिसे अल्लाह ने पवित्र ठहराया है, सिवाय न्यायोचित कारण के।” (सूरह अल-इसरा 17ः33)। ये शिक्षाएँ किसी भी प्रकार की निर्दाेषों के विरुद्ध हिंसा को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करती हैं।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साबह की शिक्षाएँ भी इसी सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करती हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक कोई व्यक्ति नाजायज़ रक्तपात नहीं करता, वह ईमान की सीमा में रहता है (सहीह अल-बुखारी, रियाज़ुस्सालिहीन 220)। युद्ध की परिस्थितियों में भी उन्होंने गैर-युद्धरत व्यक्तियों, महिलाओं, बच्चों और धार्मिक गुरुओं को हानि पहुँचाने से सख्ती से मना किया (सहीह मुस्लिम 1744)। यह दर्शाता है कि इस्लाम अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी नैतिक सीमाओं का पालन करता है, जिससे शांतिपूर्ण वातावरण में हिंसा और भी अधिक अस्वीकार्य हो जाती है।
प्रसिद्ध इस्लामी शिक्षण संस्थान जैसे दारुल उलूम देवबंद और अल-अजहर विश्वविद्यालय लगातार धर्म के नाम पर किए जाने वाले आतंकवाद और हिंसा की निंदा करते रहे हैं। जुमे के कई ख़ुत्बों (उपदेशों) में विद्वान स्पष्ट करते हैं कि निर्दाेषों को नुकसान पहुँचाना हर परिस्थिति में हराम है। वे यह भी बताते हैं कि जिहाद जैसी अवधारणाओं को अक्सर गलत समझा और गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता में इस्लाम दया, न्याय और धैर्य का संदेश देता है। ऐसे उपदेशों में अक्सर कहा जाता है कि वास्तविक शक्ति क्रोध पर नियंत्रण और संयम दिखाने में है, न कि दूसरों को हानि पहुँचाने में।
मुंबई हमले का सबसे विचलित करने वाला पहलू धार्मिक पहचान को भय और धमकी का साधन बनाना है। किसी को हिंसा करने से पहले कलमा पढ़ने के लिए मजबूर करना इस्लाम की मूल भावना के विपरीत है। इस्लाम में आस्था स्वतंत्र इच्छा और सच्चे विश्वास पर आधारित है, न कि ज़बरदस्ती पर। कुरआन स्पष्ट रूप से कहता हैरू “धर्म में कोई बलपूर्वक प्रवेश नहीं।” । इससे स्पष्ट है कि भय या हिंसा के माध्यम से किसी पर विश्वास थोपने का प्रयास इस्लामी सिद्धांतों का उल्लंघन है।
ऐसी घटनाएँ सामूहिक प्रतिक्रिया की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। समुदाय में जागरूकता आवश्यक है ताकि धार्मिक नेता, शिक्षक और परिवार गलतफहमियों को दूर कर सकें और युवाओं को सही शिक्षाओं की ओर मार्गदर्शन दे सकें। डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं ताकि उग्रवादी प्रचार के प्रसार को रोका जा सके। मानसिक स्वास्थ्य सहायता भी अहम भूमिका निभाती है, क्योंकि कट्टर सोच की ओर झुकने वाले कई लोग अक्सर अकेलेपन या भावनात्मक तनाव से जूझ रहे होते हैं। इन समस्याओं की समय रहते पहचान और समाधान हानिकारक परिणामों को रोक सकते हैं।
अंततः, मुंबई का यह चाकू हमला केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि इस बात की गंभीर चेतावनी है कि विकृत विचारधाराएँ व्यक्तिगत कमजोरियों और गलत सूचनाओं के साथ मिलकर कितनी खतरनाक बन सकती हैं। ऐसे कृत्यों की बिना किसी हिचकिचाहट के निंदा की जानी चाहिए, विशेषकर तब जब इस्लामी शिक्षाएँ स्पष्ट रूप से निर्दाेषों के विरुद्ध हिंसा को प्रतिबंधित करती हैं।
इस्लाम अपने मूल स्वरूप में शांति, गरिमा और न्याय का धर्म है। समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इन मूल्यों की रक्षा की जाए और किसी को भी धर्म का दुरुपयोग कर हिंसा को उचित ठहराने की अनुमति न दी जाए।
इंशा वारसी
फ़्रैंकोफ़ोन एवं पत्रकारिता अध्ययन

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