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उत्तराखंडदेहरादून

विरासत साधना में प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं की स्वर प्रस्तुति से भक्ति रस में झूमे श्रोतागण

Lokesh Badoni
Last updated: October 8, 2025 4:11 pm
Lokesh Badoni Published October 8, 2025
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देहरादून। विरासत साधना की स्वर प्रस्तुति कार्यक्रम में बुधवार को कई विद्यालयों व शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं ने अपने-अपने कला गायन का सराहनीय एवं प्रशंसनीय प्रदर्शन किया । ओएनजीसी के डॉ.भीमराव अंबेडकर स्टेडियम में आयोजित भव्य विरासत साधना स्वर में प्रातःकाल शानदार प्रस्तुतियां दी गई। कार्यक्रम में देहरादून के विभिन्न प्रतिष्ठित विद्यालयों और संस्थानों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों ने अपने कला गायन को प्रकट करने का सुनहरा अवसर विरासत महोत्सव के मंच पर सौभाग्यवश हासिल किया। सभी होनहार विद्यार्थियों का साथ स्वर संगीत की प्रस्तुति में कुशल वादकों ने दिया, जिससे कि  उनकी प्रस्तुतियाँ और भी बेहतरीन आकर्षक और भव्यतम  बन गईं।


लतिका रॉय फाउंडेशन के सिद्धार्थ शाक्य ने जागो मोहन प्यारे……. का गायन कर विरासत साधना की महफ़िल में चार चांद लगा दिए । सिद्धार्थ के साथ संगत में गर्गी भट्टाचार्य व राजेश कालनी की जोड़ी ने इस विरासत साधना में भक्ति रस घोलने का काम किया । इसके अलावा प्रतिभाग करने वालों में वागीश्वरी संगीत साधना से प्रमिति डालाकोटी (स्वर), जिसमें संगत अजय मिश्रा की,सेंट पैट्रिक्स अकादमी से पावनी अग्रवाल जिसमें संगत अनेश कांत ने दी ।
इसके अलावा अन्य प्रस्तुतियां देने वालों में सेंट कबीर अकादमी, देहरादून के आयुष्मान शुक्ला जिसमें संगत पारिधि उनियाल, प्रकाश व लोकेश मदान की रही,सरस्वती संगीत मंदिर से आयुष गुप्ता (स्वर) संगत : तर्ष सेठी, श्रिया, मोहित बेंजवाल,पीवाईडीएस लर्निंग अकादमी से सलोनी (स्वर) के साथ संगत शिशिर गुनीयाल, शिवम लोहिया व भूमि‍का गुप्ता की रही । इसी श्रृंखला में दून इंटरनेशनल स्कूल से समृद्धि पैन्यूली (स्वर) संगत अजय मिश्रा, कर्नल ब्राउन स्कूल से नलिनाकाश भट्टाचार्य (स्वर) संगत अनेश कांत, द यूनिवर्सल अकादमी देहरादून से नंदनी सिंह (स्वर) संगत अनेश कांत, उत्तराखंड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से जिग्मे वोंगचुक लेपचा (स्वर) जिसमें संगत योगेश खेतवाल और अनेश कांत की रही है । टाइम्स वर्ल्ड स्कूल के  छात्र शिवांश वर्मा (स्वर) संगत अभिनव पुष्प व आर्यन कांत तथा अंत में द एशियन स्कूल देहरादून से वैष्णवी काला (स्वर) जिसमें कि संगत अरुणव तिवारी,एंजल घोष,मरजस सिंह बावा एवं सान्वी तोमर शामिल हैं । सभी की शानदार व भक्तिमय सांस्कृतिक कला से ओत प्रोत रही प्रस्तुतियों ने विद्यार्थियों की लगन,अनुशासन और साधना को सुंदर रूप में विरासत साधना के मंच पर बखूबी दर्शाया। बच्चों द्वारा दर्शाई गई आत्मविश्वास और सहजता के साथ अपनी अद्भुत संगीत कला प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों का मन-हृदयमोह लिया। तत्पश्चात सभी प्रतिभाशाली प्रतिभागियों को आज की विरासत साधना की मुख्य कोऑर्डिनेटर कल्पना शर्मा और राधा चटर्जी द्वारा सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया।

शास्त्रीय संगीत की दुनिया के युवा गिटार वादक दीपक क्षीरसागर की प्रस्तुति ने किया श्रोताओं के दिलों पर राज


विरासत के शानदार मंच पर अब तक कई शास्त्रीय संगीत के मशहूर कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से लाखों प्रशंसकों के दिलों पर राज कर चुके हैं, तो वहीं आज बुधवार को विरासत की अनमोल संध्या पर मशहूर गिटार वादक ने भी श्रोतागणों पर अपना जादू चला डाला I उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुन एवं राग ध्वनि से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कियाI पं. दीपक क्षीरसागर जी ने राग नंद में एक सुंदर रचना के साथ अपने कार्यक्रम का समापन किया एवं  पंडित मिथिलेश झा ने उन्हें तबला पर संगत दी।
प्रसिद्ध गिटार वादक दीपक क्षीरसागर विश्व प्रसिद्ध शास्त्रीय गिटारवादक हैं। वे शास्त्रीय गिटार में ऑल इंडिया रेडियो के सर्वोच्च श्रेणी के कलाकार और गायन में ए-ग्रेडेड कलाकार हैं, जो देश के बहुत कम संगीतकारों को प्राप्त है। पं. क्षीरसागर भारतीय स्लाइड गिटार पर गायकी अंग की अपनी अनूठी तकनीक विकसित करने के लिए विख्यात हैं। वे ग्वालियर घराने की पं.बीएन क्षीरसागर की परंपरा से जुड़े हैं। बाद में उन्होंने पं.सतीश खानवलकर से भारतीय स्लाइड गिटार की शिक्षा प्राप्त की। भारतीय स्लाइड गिटार, हवाईयन गिटार का एक संशोधित और पुनर्परिभाषित संस्करण है। इसे सर्वप्रथम पं. गोपाल सिंह हजारा ने प्रस्तुत किया था और बाद में जोधपुर के पं. बृजभूषण काबरा ने इसे स्थापित किया। आजकल इस वाद्य यंत्र के कई मानवीकृत नाम प्रचलित हैं। इसे हिंदुस्तानी तकनीक में स्टील की छड़ से बजाया जाता है। शीर्ष पर तीन प्रमुख तार और एक चिकरी जोड़ा, स्वरों की बेहतर निरंतरता के लिए सितार जैसे वाद्ययंत्रों की तरह तारब तार मुख्य तारों के नीचे लगाए गए हैं। शुद्ध शीशम और स्प्रूस से बना भारतीय स्लाइड गिटार भारतीय शास्त्रीय संगीत और सुगम संगीत के आयोजकों और श्रोताओं के बीच बहुत लोकप्रिय है। मुख्य बात यह है कि गिटार वादक दीपक क्षीरसागर मात्र 27 वर्ष के हैं और अविवाहित भी हैं, अर्थात इतनी कम आयु में उन्होंने विश्व स्तर पर बड़ी ख्याति हासिल कर ली है I
सांस्कृतिक और संगीत की दृष्टि से समृद्ध वातावरण में वे जन्मे और पले-बढ़े I उन्होंने बहुत कम उम्र से ही शास्त्रीय संगीत के प्रति रुझान विकसित कर लिया था। उन्होंने कम उम्र में ही रेडियो के लिए प्रदर्शन करना शुरू कर दिया था और उन्हें संस्कृति मंत्रालय से छात्रवृत्ति और फेलोशिप मिली थी। एक शास्त्रीय गिटारवादक के रूप में अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने भारतीय स्लाइड गिटार पर गायकी अंग के दायरे का पता लगाया, जिससे यह वाद्य संगीत की सबसे सुंदर और अनूठी तकनीकों में से एक बन गया। पं. क्षीरसागर कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हैं जिनमें युवा रत्न, सुरमणि-सुर सिंगार संसद, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार आदि सम्मिलित हैं ।

बेलारूस के कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से विरासत में मौजूद लोगों का दिल जीता
आज विरासत का संध्याकाल विरासत के प्रेमियों, प्रशंसकों के लिए बहुत ही अधिक उत्साह वाला और यादगार रूप में दर्ज हो गया है I यह बेलारूस गणराज्य पूर्वी यूरोप का एक देश है। इसकी राजधानी मिन्स्क है। इस देश की सांस्कृतिक विरासत और स्थापत्य कला इसकी पहचान है। बेलारूस वासियों की सांस्कृतिक पहचान नैतिकता और मानवता के सर्वोच्च आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित है। सदियों से ये मूल्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते रहे हैं। ये अच्छे और न्याय के उच्च आदर्श हैं और दूसरों के प्रति सम्मान, बुराई और हिंसा का कड़ा विरोध भी सदैव करते हैं। बेलारूसी कलाकारों में विटाली क्लिमाकोव (मुखर), ल्यूडमिला त्रासेन्का (झांझ), एलिना पियाटकोविच (वायलिन), रीमा मिकालिच (बांसुरी),चुबिन सियारही (बास गिटार), राहोज़ा लिउबो (गायन), अलियाक्सेंडर यात्सकोविच (टैम्बोरिन), विक्टर क्लिमिखिन (त्रिकोण),अर्लू अलेह (ड्रम) तथा इरीना कुस्तियुक (वायलिन) शामिल हैं I बेलारूस गणराज्य का सम्मानित शौकिया समूह लोक संगीत समूह “स्पैडचिना”है। इस समूह के प्रदर्शनों की सूची में बेलारूसी लोक गीतों और नृत्यों के साथ-साथ बेलारूसी संगीतकारों द्वारा रचित रचनाएं  भी शामिल हैं।

विरासत में साजन मिश्रा के गायन पर फ़िदा हुए प्रशंसक और श्रोतागण


हिंदुस्तानी संगीत की दुनिया के मशहूर कलाकार पंडित साजन मिश्रा ने राग मालकौंस में विलंबित ख्याल में बंदिश “पीर न जाने बालमा…..” से शानदार शुरुआत की। इस बेहद अंदाज और राग वाली प्रस्तुति में उनके साथ उन्हीं के सुपुत्र स्वरांश मिश्रा भी साथ रहे। मशहूर साजन मिश्रा की इस सांस्कृतिक महफिल में साथ देने वाले तबला वादन शुभ महाराज और हारमोनियम वादन पं.धर्मनाथ मिश्र रहे । बेहतरीन इस जुगलबंदी के साथ सजी विरासत की इस महफ़िल में पंडित साजन मिश्रा व उनके पुत्र स्वरांश मिश्रा ने श्रोताओं को सांस्कृतिक भक्ति से प्रफुल्लित कर दिया I स्वरांश मिश्रा महान “बनारस घराने” से संबंधित शास्त्रीय संगीत की छठी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं । भारतीय संगीत परंपरा में गहरी जड़ें रखने वाले पंडित साजन मिश्रा के पुत्र और शिष्य तथा कथक नृत्य के अग्रणी प्रतिपादक और मशालवाहक पंडित बिरजू महाराज के पोते स्वर्णांश एक बहुमुखी संगीतकार हैं, जो एक गीतकार, संगीतकार और एक आकर्षक वक्ता के नाम से भी विख्यात हैं। विरासत महोत्सव में ख्याल शैली के लोकप्रिय पंडित साजन मिश्रा का गायन लोगों को इतना अधिक भाया कि वे झूम झूम कर भरपूर आनंद लेते रहे I देखते ही देखते इस शाही विरासत की महफिल में उनके प्रशंसक तथा श्रोताओं की संख्या से पंडाल भर गया I पं.साजन मिश्रा भारतीय शास्त्रीय संगीत के ख्याल शैली के लोकप्रिय गायक हैं। इस शैली की गायकी बनारस घराने की 300 साल पुरानी शैली मानी जाती है। मिश्रा बंधु पूरे भारत के साथ-साथ विश्व भर में अपनी गायन कला का प्रदर्शन करते रहे हैं। वे बनारस घराने के भारत के महान गायक हैं। उन्होंने अपने संगीत करियर की शुरुआत किशोरावस्था में ही कर दी थी।  अब अपने भाई और पार्टनर पंडित राजन जी के निधन के बाद उन्होंने अपने बेटे स्वरांश के साथ गायन  शुरू किया I मिश्रा बंधुओं ने जर्मनी, फ्रांस, यूके ,अमेरिका,स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया,मस्कट, नीदरलैंड, यूएसएसआर, कतर और सिंगापुर जैसे कई अन्य देशों में प्रदर्शन किया है। उन्होंने ख्याल शैली अथवा अर्ध शास्त्रीय टप्पा और विभिन्न प्रकार के भजनों के लगभग 20 संगीत एल्बम लॉन्च भी किए थे। साजन मिश्रा का जन्म सन् 1956 में वाराणसी में हुआ था। उनके दादा बड़े रामदास मिश्र और पिता हनुमान प्रसाद मिश्र ने उन्हें शास्त्रीय संगीत सिखाया। वर्ष 2007 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया I उन्हें 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1994-1995 में गंधर्व राष्ट्रीय पुरस्कार और दिसंबर 2012 को 2011-12 के लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय तानसेन सम्मान भी मिला।

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