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उत्तराखंडदेहरादून

विरासत आर्ट एंड हैरिटेज महोत्सव की पहली शाम… रंगारंग एवं आकर्षक छोलिया नृत्य के नाम

Lokesh Badoni
Last updated: October 4, 2025 3:44 pm
Lokesh Badoni Published October 4, 2025
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  • महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने राष्ट्रीय गान के पश्चात दीप प्रज्वलन कर किया विरासत महोत्सव का भव्य शुभारंभ
  • पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी हुए विरासत में शामिल

देहरादून। विश्व स्तर पर भारतीय लोक कला एवं सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए रखने वाली अति लोकप्रिय रीच संस्था के विरासत महोत्सव का इस वर्ष 2025 का आगाज हो चुका है । महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने विरासत महोत्सव का शुभारंभ राष्ट्रगान के बाद दीप प्रज्ज्वलित कर किया। उन्होंने कहा कि हमारा राष्ट्र विश्व गुरु बनने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। मानवता के कल्याण से हमारा देश दुनिया भर में आगे बढ़ रहा है। हम अपने भारत की सभ्यता को पूजते हैं, जिस पर हमें गर्व है। हमारी संस्कृति हम सभी की संस्कृति है, जिसे हमें सदैव संजोए कर रखना है। महामहिम राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने यह भी कहा कि योग को हमारे देश के प्रधानमंत्री ने वैश्विक स्तर पर पहुंचाया है, जो कि हमारे लिए बहुत ही बड़े गर्व की बात है।
यहां कौलागढ़ रोड स्थित ओएनजीसी के डॉ.भीमराव अंबेडकर स्टेडियम में आज शनिवार की मनमोहक सांयकाल भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज उस्ताद अमजद अली खान के सरोज वादक तथा सुप्रसिद्ध छोलिया नृत्य के साथ विरासत महोत्सव का भव्यतम रूप में शुभारंभ हुआ।


विरासत महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर मुख्य रूप से रीच संस्था के संस्थापक सदस्य व महासचिव आरके सिंह,संयुक्त सचिव विजयश्री जोशी, उत्तराखंड के महालेखाकार मोहम्मद परवेज आलम, शिल्प निदेशक सुनील वर्मा, मीडिया कोऑर्डिनेटर प्रियवंदा अय्यर, प्रदीप मैथिल उपस्थित रहे।
विरासत महोत्सव की आज की मनमोहक शाम में मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान की लयबद्ध तान और सुर ने सभी श्रोताओं को मग्न मुग्ध कर दिया। अमजद अली खान ने अपनी स्वयं की संगीतबद्ध राग गणेश कल्याण से शुरुआत की, इसी श्रृंखला में उनकी अगली प्रस्तुति राग देश में एक सुंदर बंदिश थी। आज की शानदार इस महफिल में मशहूर सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान के साथ मंच पर विराजमान हुए कलाकारों फतेह सिंह और मिथिलेश झा ने तबले पर जुगलबंदी की।


पहली शाम के मुख्य मेहमान रहे उस्ताद अमजद अली खान का सरोज वादन बेहद मनमोहक एवं प्रशंसनीय रहा। भारतीय शास्त्रीय संगीत के दिग्गज सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान अपनी स्पष्ट और तेज़ एवं अति मनमोहक व मधुर तानों के लिए विश्व भर में विख्यात हैं। उनका जन्म ग्वालियर के एक शास्त्रीय संगीत परिवार में हुआ, जो सेनिया घराने के वंश का हिस्सा हैं। उनके पिता उस्ताद हाफ़िज़ अली खान ही उनके पहले गुरु थे। मुख्य बात यह है कि उनका वंश तानसेन से जुड़ा है और इस घराने को सरोद के आविष्कार का श्रेय दिया जाता है। जिसने कि निश्चित रूप से कई महान कलाकार दिए हैं।
उस्ताद अमजद अली खान एक ऐसी हस्ती हैं, जिन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और दूसरे सर्वाेच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और फ़ेलोशिप भी प्रदान की गई है। विश्व पटल पर भारत और यहां के शास्त्रीय संगीत का नाम रोशन करने वाले उस्ताद अमजद अली खान खान ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इतिहास में कई रागों को शामिल किया है। स्वामी हरिदास के सम्मान में राग हरिप्रिया कणाद उस्ताद अमजद अली खान की मुख्य पहचान में भी शामिल है। उन्होंने शास्त्रीय विद्या के जगत में उस्ताद अमीर खान के सम्मान में राग अमीरी तोड़ी। जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में 1990 में रचित राग जवाहर मंजरी,राग प्रियदर्शिनी, इंदिरा गांधी की स्मृति में रचित राग हाफ़िज़ कौन्स, ख़ान के पिता और गुरु, हाफ़िज़ अली ख़ान के सम्मान में रचित राग किरणरंजनी,राग ललिता ध्वनि,राग शिवांजलि के अलावा और भी बहुत कुछ सम्मान भारतीय शास्त्रीय लोक कला को देकर विश्व स्तर पर भारत का नाम ऊंचा किया है। यही नहीं, उन्होंने 1960 के दशक से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुति भी दी हैं।
इस मशहूर शख्सियत उस्ताद अमजद अली खान ने पहली बार 1963 में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रस्तुति दी और 2000 के दशक तक अपने बेटों के साथ प्रस्तुति देते रहे। उन्होंने अपने पूरे करियर में अपने वाद्य यंत्र में बदलाव के साथ प्रयोग किए हैं। ख़ान ने हांगकांग में फिलहार मोनिक ऑर्केस्ट्रा के साथ वादन किया और न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय में अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। खास बात यह भी है कि उनको 21वें राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। आज विरासत महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर उस्ताद अमजद अली खान ने उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून में कदम रखकर शास्त्रीय संगीत की दुनिया में सभी का दिल जीत लिया।
खान साहब के साथ जयपुर घराने के पंडित फतेह सिंह गंगानी भी थे। उन्होंने गुरु कुंदनलाल जी, पुरुषोत्तम दास जी और गंगाराम जी के कुशल मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने संगीत जगत के कई दिग्गजों के साथ विभिन्न समारोहों में प्रस्तुति दी है।
उस्ताद अमजद अली खान जी के साथ तबले पर मिथिलेश झा ने संगत दी। बिहार के एक छोटे से कस्बे में जन्मे पंडित मिथिलेश कुमार झा ने छह साल की छोटी सी उम्र में अपने पिता और गुरु स्वर्गीय गोपी कांत झा से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, जिसके बाद उन्होंने बनारस घराने के स्वर्गीय पंडित बुलबुल महाराज से मार्गदर्शन प्राप्त करना जारी रखा।
बाद में उन्हें उस्ताद अमजद अली खान से सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने भारत और विदेशों में विश्व प्रसिद्ध, प्रमुख कलाकारों के साथ एकल और संगत में विभिन्न प्रदर्शन दिए हैं। उन्हें बिहार सरकार से कला संस्कृति विभाग का राज्य पुरस्कार और भारती विद्या भवन द्वारा विद्याश्री पुरस्कार प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने पाकिस्तानी और हॉलीवुड फिल्मों में भी अपना संगीत दिया है। पंडित जी आकाशवाणी और टेलीविजन के एक उच्च कोटि के कलाकार हैं।
वहीं दूसरी ओर, अद्भुत एवं लोक कला की विशेष सांस्कृतिक धरोहर में शामिल नृत्य छोलिया की प्रस्तुति आज पहली ही शाम को अमिट छाप हजारों दर्शकों एवं श्रोताओं के मन हृदय में छोड़ गई है। यह छोलिया नृत्य उत्तराखंड राज्य की ही उद्यांचल कला समिति, अल्मोड़ा के 20 सदस्यों चंदन आर्य, नवीन आर्य, दिगर राम, रघुनाथ आर्य, भवान आर्य, मोहन कुमार, राजेश कुमार, दिनेश आर्य, कुंवर राम, ललित कुमार, केशव आर्य, ललित आर्य, नवाजिश, विशाल कुमार, रंजीत कुमार आदि द्वारा पारंपरिक तरीके से प्रस्तुत किया गया। यह छोलिया एक पारंपरिक लोक नृत्य शैली है, जिसकी उत्पत्ति भारतीय राज्य उत्तराखंड और नेपाल के पश्चिमी प्रांत के कुमाऊँ मंडल में हुई।
आज यह कुमाऊँनी और सुदूरपश्चिमी संस्कृतियों का प्रतीक बन गया है। यह मूलतः विवाह जुलूस के साथ किया जाने वाला तलवार नृत्य है, लेकिन अब इसे कई शुभ अवसरों पर भी किया जाता है।
यह कुमाऊँ मंडल के अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ जिलों और नेपाल के डोटी, बैतड़ी और दार्चुला जिलों में विशेष रूप से लोकप्रिय है। इस तलवार नृत्य का इतिहास एक हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है। इसकी उत्पत्ति कुमाऊँ के युद्धरत क्षत्रियों-खस और कत्यूरियों से हुई है, जब विवाह तलवारों की नोक पर संपन्न होते थे। मान्यता है कि युद्ध जैसे संगीत के साथ, तलवारों से लैस होकर, वे अपने साथी नर्तकों के साथ नकली युद्ध करते हुए पूरी तरह से तालमेल बिठाकर नृत्य करते हैं। त्रिकोणीय लाल झंडा लिए निशान अपनी तलवारें लहराते हैं । छोलिया नृत्य करने वालों के चेहरों पर पारंपरिक रूप वाले उग्र भाव देखते ही झलक रहे थे । वे छोलिया नृत्य के माध्यम से युद्ध में जाने वाले योद्धाओं का आभास देते हैं ।

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