सम्पादकीय
सम्पादकीय गुण और दोष तो सबके जीवन में होते हैं। किसी के जीवन में कम होते हैं, और किसी के जीवन में अधिक। *”जिसके सारे दोष समाप्त हो जाते हैं, उसका मोक्ष हो जाता है। फिर उसका तत्काल अगला जन्म नहीं होता।”* तो जिस-जिस ने भी संसार में जन्म लिया है, उसके विषय में समझ लीजिए, कि *”उस व्यक्ति में कुछ न कुछ दोष अभी बचे हुए हैं। उन्हीं दोषों को दूर करने के लिए ही संसार में उसका जन्म हुआ है।”* दोष सदा दुखदाई होते हैं, स्वयं के लिए भी, और दूसरों के लिए भी। जब सभी में दोष हैं, तो ऐसी स्थिति में दुखों से बचने के लिए सबको अपने अपने दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।”* “कुछ दोष तो आत्म निरीक्षण करने से स्वयं को पता चल जाते हैं। परंतु कुछ दोष ऐसे होते हैं, जो स्वयं को पता नहीं चल पाते। ऐसे दोषों को दूसरे लोग बताते हैं।”* आपके अंदर भी ऐसे कुछ दोष हो सकते हैं, जो आपको स्वयं पता न चल पाते हों, और आपके साथ रहने वाले परिवार के सदस्य अथवा मित्र लोग आपको बताते हों। और ऐसा ही आप भी करते होंगे। *”आप भी दूसरों को दोष बताते होंगे। दूसरों को दोष बताएं। प्रेम से बताएं। उनके हित के लिए बताएं। मीठी भाषा में बताएं, ताकि उनके दोष दूर हो जाएं।”* परंतु दूसरे व्यक्ति को दोष बताने से पहले इतना ध्यान अवश्य रखें, कि *”पहले अपने अंदर भी झांक कर देख लें, कि कहीं वही दोष आपके अंदर भी तो नहीं है, जो दोष आप दूसरे व्यक्ति को बताने जा रहे हैं।” “यदि वही दोष आपके अपने अंदर भी हो, तो पहले अपने उस दोष को दूर कर लें। उसके बाद दूसरे व्यक्ति को आप वह दोष बताएं।” “ऐसा करने पर आपको दोष बताने का अधिकार भी मिल जाता है, और उसका दूसरे व्यक्ति पर प्रभाव भी अच्छा पड़ता है।”* जैसे कोई व्यक्ति स्वयं शराब पीता हो, और वह दूसरों को मना करे, कि *”आप शराब मत पीओ, यह हानिकारक है।”* तो उसे ऐसा कहने का अधिकार नहीं है। और कहने पर भी उसका दूसरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बल्कि हो सकता है, दूसरे लोग ही उसको डांटने लगें, कि**”भाई मुझे कहने से पहले तू अपनी शराब तो छोड़ दे। फिर मुझे कहना।” “हां, जिसने शराब पीना छोड़ दिया हो, उसको भी अधिकार मिल जाता है, कि वह दूसरों को प्रेम से बताए, कि शराब पीना छोड़ दो, यह हानिकारक है।”* “इसलिए पहले अपने दोषों को दूर करें। फिर दूसरों को प्रेम पूर्वक उनके दोष बताएं। तब धीरे-धीरे अपने और दूसरों के दोष छूटते जाएंगे। सबके जीवन में दुख कम होता जाएगा। दोषों को छोड़ने के साथ-साथ उत्तम गुणों को भी धारण करें, तभी आपके जीवन में सुख बढ़ेगा, अन्यथा नहीं।”*
गुण और दोष तो सबके जीवन में होते हैं। किसी के जीवन में कम होते हैं, और किसी के जीवन में अधिक। *”जिसके सारे दोष समाप्त हो जाते हैं, उसका मोक्ष हो जाता है। फिर उसका तत्काल अगला जन्म नहीं होता।”* तो जिस-जिस ने भी संसार में जन्म लिया है, उसके विषय में समझ लीजिए, कि *”उस व्यक्ति में कुछ न कुछ दोष अभी बचे हुए हैं। उन्हीं दोषों को दूर करने के लिए ही संसार में उसका जन्म हुआ है।”*
दोष सदा दुखदाई होते हैं, स्वयं के लिए भी, और दूसरों के लिए भी। जब सभी में दोष हैं, तो ऐसी स्थिति में दुखों से बचने के लिए सबको अपने अपने दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।”*
“कुछ दोष तो आत्म निरीक्षण करने से स्वयं को पता चल जाते हैं। परंतु कुछ दोष ऐसे होते हैं, जो स्वयं को पता नहीं चल पाते। ऐसे दोषों को दूसरे लोग बताते हैं।”* आपके अंदर भी ऐसे कुछ दोष हो सकते हैं, जो आपको स्वयं पता न चल पाते हों, और आपके साथ रहने वाले परिवार के सदस्य अथवा मित्र लोग आपको बताते हों। और ऐसा ही आप भी करते होंगे। *”आप भी दूसरों को दोष बताते होंगे। दूसरों को दोष बताएं। प्रेम से बताएं। उनके हित के लिए बताएं। मीठी भाषा में बताएं, ताकि उनके दोष दूर हो जाएं।”*
यह सामान्य नियम है, कि *”अपना दोष सुनने में व्यक्ति को कष्ट का अनुभव होता है।”* इस नियम के अनुसार जब आप दूसरे व्यक्ति को उसका कोई दोष बताएंगे, तो सुनने में उसे भी कष्ट होगा ही। उस कष्ट को दूर करने के लिए, अथवा कम करने के लिए यह अच्छा रहेगा, कि *”दूसरे व्यक्ति का दोष बताने से पहले आप उसके कुछ गुण बताएं। अपने गुण सुनने से व्यक्ति को प्रसन्नता होती है। जब आप दूसरे व्यक्ति को उसके कुछ गुण बताएंगे, तो वह प्रसन्न हो जाएगा। फिर प्रेम से मीठी भाषा में उसके हित के लिए उसका एक आध दोष बताएंगे, तो वह उसे सुनकर सहन कर लेगा। इस प्रकार से दूसरों को दोष बताना चाहिए।”*
परंतु दूसरे व्यक्ति को दोष बताने से पहले इतना ध्यान अवश्य रखें, कि *”पहले अपने अंदर भी झांक कर देख लें, कि कहीं वही दोष आपके अंदर भी तो नहीं है, जो दोष आप दूसरे व्यक्ति को बताने जा रहे हैं।” “यदि वही दोष आपके अपने अंदर भी हो, तो पहले अपने उस दोष को दूर कर लें। उसके बाद दूसरे व्यक्ति को आप वह दोष बताएं।” “ऐसा करने पर आपको दोष बताने का अधिकार भी मिल जाता है, और उसका दूसरे व्यक्ति पर प्रभाव भी अच्छा पड़ता है।”*
*”यदि आप स्वयं उस दोष को आजकल भी करते हों, और दूसरों को कहते हों, कि “आप यह दोष न करें।” “तो ऐसी स्थिति में न तो आपको दोष बताने का अधिकार है। और यदि आप बता भी देंगे, तो उसका दूसरे व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वह उस दोष को दूर नहीं करेगा।” “हो सकता है, आपके मुंह पर आपको कह भी दे, कि “पहले अपना दोष तो दूर कर लीजिए, फिर मुझे उपदेश दीजिएगा।”*
जैसे कोई व्यक्ति स्वयं शराब पीता हो, और वह दूसरों को मना करे, कि *”आप शराब मत पीओ, यह हानिकारक है।”* तो उसे ऐसा कहने का अधिकार नहीं है। और कहने पर भी उसका दूसरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। बल्कि हो सकता है, दूसरे लोग ही उसको डांटने लगें, कि**”भाई मुझे कहने से पहले तू अपनी शराब तो छोड़ दे। फिर मुझे कहना।” “हां, जिसने शराब पीना छोड़ दिया हो, उसको भी अधिकार मिल जाता है, कि वह दूसरों को प्रेम से बताए, कि शराब पीना छोड़ दो, यह हानिकारक है।”*
“इसलिए पहले अपने दोषों को दूर करें। फिर दूसरों को प्रेम पूर्वक उनके दोष बताएं। तब धीरे-धीरे अपने और दूसरों के दोष छूटते जाएंगे। सबके जीवन में दुख कम होता जाएगा। दोषों को छोड़ने के साथ-साथ उत्तम गुणों को भी धारण करें, तभी आपके जीवन में सुख बढ़ेगा, अन्यथा नहीं।”*