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ब्रिटिश सरकार शासित क्षेत्रों के अलावा देश के अन्य राज्यों-रियासतों, राज-रजवाड़ों के क्षेत्र में भी आजादी की लड़ाई ने अंगड़ाई ली। रियासतों में भी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने बहुत साहस से इस संघर्ष को आगे बढ़ाया। इन स्वतंत्रता सेनानियों में एक बहुत प्रेरणादायक नाम श्रीदेव सुमन का है, जो टिहरी (उत्तराखंड) संघर्ष में अपने महान बलिदान के कारण प्रेरणा स्रोत हैं।*श्री देव सुमन का जन्म टिहरी जनपद के जौल गांव में 25 मई 1916 को हरिराम बडोनी तथा तारा देवी के घर में हुआ था। सन 1919 में श्री देव सुमन के पिता का निधन हो गया था। मिडिल परीक्षा पास करने के बाद श्री देव सुमन सन 1932 में अध्यापक बन गए थे। प्रतिभा के धनी श्री देव सुमन ने बेहद कम आयु में ही एक समाजसेवी, लेखक* *और कवि के रूप में पहचान स्थापित कर ली थी।* साल 1938 में गढ़वाल जिला कांग्रेस कमेटी का राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसमें जवाहरलाल नेहरु आए। श्रीदेव सुमन ने विशेषकर टिहरी के लोगों की समस्याओं को बहुत प्रभावशाली ढंग से रखा और जवाहरलाल नेहरू से इस विषय पर उनसे अलग से भी बातचीत की।*1939 के आरंभ में देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की गई। श्रीदेव सुमन इसकी संयोजक समिति के मंत्री चुने गए और वे बहुत उत्साह से इसके कार्य के प्रसार में लग गए। इसी वर्ष लुधियाना में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के अधिवेशन में उनकी योग्य और उत्साहवर्धक भूमिका से आकर्षित होकर परिषद् के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें लोक परिषद की स्थायी समिति में हिमालय प्रान्तीय देशी राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में चुना।*24 वर्ष की आयु में ही इतनी बड़ी जिम्मेदारियां सिर पर आ जाने के बाद तो श्रीदेव सुमन का जीवन बहुत व्यस्त हो गया। कभी दिल्ली दौड़े चले जा रहे हैं, तो कभी वर्धा, कभी शिमला तो कभी बम्बई। पर इन तमाम व्यस्तताओं के बीच वे कभी-कभी अपने गांव जाने का समय जरूर निकालते थे और इस तरह अपने क्षेत्र के लोगों के दुख-दर्द को नजदीक से जानने-समझने का अवसर भी प्राप्त करते थे।**अप्रैल 1940 में दिल्ली में श्रीदेव सुमन की अध्यक्षता में ‘गढ़वाल राज्य प्रवासी प्रजा सम्मेलन’ आयोजित हुआ। इसी समय के आसपास वे ‘कांग्रेस सत्याग्रह समिति’ की गढ़वाल उपसमिति के संयोजक भी चुने गए। उन्होंने टिहरी जाकर जनसभाएं आयोजित करने का प्रयास किया, पर पुलिस-प्रशासन ने ऐसा करने नहीं दिया। 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” आरंभ होने के बाद टिहरी जैसे देशी रियासतों के जन-आंदोलनों में भी उभार आया।**अगस्त महीने में बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सम्मेलन में देशी नरेशों से मांग की गई कि वे ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध विच्छेद करें और लोगों के प्रति उत्तरदायी शासन घोषित करें। वहां से लौटकर सुमन ने मसूरी में अपने साथियों से विचार विमर्श किया और टिहरी राजशाही को भी उत्तरदायी शासन स्थापित करने, बेगार और अन्यायपूर्ण कर समाप्त करने, प्रजामंडल को भली-भांति कार्य करने के अवसर प्रदान करने का मांग पत्र भेज दिया।**इन्हीं मांगों को आगे बढ़ाने के लिए 10 सितंबर को कार्यकर्ताओं का एक सम्मेलन टिहरी में आयोजित किया गया। किन्तु सुमन को टिहरी पंहुचने से पहले ही देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया और अनेक अन्य कार्यकर्ताओं के साथ देहरादून जेल भिजवा दिया गया। नवंबर में सुमन को अनेक अन्य साथियों सहित आगरा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।**एक साल और 62 दिन की कैद के बाद, 19 नवंबर 1943 को सुमन रिहा हुए। दिसंबर में उन्होंने टिहरी रियासत में प्रवेश किया और लगभग एक सप्ताह अपने गांव जौल में गुजारा। 27 दिसंबर को वे टिहरी के लिए निकल पड़े, लेकिन चम्बा में पुलिस ने उन्हें रोक दिया।**यहीं से सुमन ने उच्चाधिकारियों को अपने सार्थक उद्देश्य के बारे में पत्र लिखा। 30 दिसंबर को उत्तर के दौरे पर पुलिस सुपरिंटेडैंट चंबा पंहुच गए और उन्हीें की बंद मोटर में श्रीदेव सुमन को टिहरी जेल के भीतर पंहुचा दिया गया। आगरा सेंट्रल जेल से छूटे हुए अभी उन्हें मात्र 41 दिन ही हुए थे।**जेल में सुमन के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्हें प्रताड़ित कर, माफीनामा लिखने को मजबूर करने की बेतहाशा कोशिशें कीं गईं। इंकार करने पर उन्हें भारी यातनाएं दी गईं, तो भी सुमन अपने पथ से तनिक न डिगे। जेल में उन्हें सबसे अलग रखा जाता और किसी से भी मिलने नहीं दिया जाता था।* *जब सुमन की सभी लोकतांत्रिक मांगें अस्वीकृत होती गईं, तो 3 मई 1944 को उन्होंने अपना वह ऐतिहासिक अनशन आरंभ किया, जो सदा के लिए विश्व के त्याग और बलिदान के इतिहास में दर्ज हो चुका है। अनशन आरंभ होने के बाद सुमन पर अत्याचार और भी बढ़ गए। उन्हें रोज बेंतों और डंडों से पीटा जाता था और जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयास किया जाता था। जब यह सब कोशिशें सफल न हुईं तो, उन्हें जेल अस्पताल की एक कोठरी में डाल दिया गया। यहां भी उन पर शारीरिक जुल्म ढाये जाते थे।* *सुमन की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती देखकर अधिकारियों ने उनकी बीमारी की अफवाह फैलाई. मात्र 29 वर्ष की आयु में 84 दिनों के उपवास के बाद, 25 जुलाई 1944 को टिहरी जेल में, अहिंसक संघर्ष के पुजारी सुमन का प्राणान्त हुआ।**सुमन गढ़वाल के गौरव थे। उन्हें निर्ममता से मारा गया और इस हत्या में टिहरी की राजशाही की सीधी जिम्मेदारी थी। इससे लोगों का राजशाही के प्रति अन्धविश्वास तेजी से टूटने लगा ।*इस क्रांतिकारी वीर नायक को शत-शत नमन
ब्रिटिश सरकार शासित क्षेत्रों के अलावा देश के अन्य राज्यों-रियासतों, राज-रजवाड़ों के क्षेत्र में भी आजादी की लड़ाई ने अंगड़ाई ली। रियासतों में भी कई स्वतंत्रता सेनानियों ने बहुत साहस से इस संघर्ष को आगे बढ़ाया। इन स्वतंत्रता सेनानियों में एक बहुत प्रेरणादायक नाम श्रीदेव सुमन का है, जो टिहरी (उत्तराखंड) संघर्ष में अपने महान बलिदान के कारण प्रेरणा स्रोत हैं।*
श्री देव सुमन का जन्म टिहरी जनपद के जौल गांव में 25 मई 1916 को हरिराम बडोनी तथा तारा देवी के घर में हुआ था। सन 1919 में श्री देव सुमन के पिता का निधन हो गया था। मिडिल परीक्षा पास करने के बाद श्री देव सुमन सन 1932 में अध्यापक बन गए थे। प्रतिभा के धनी श्री देव सुमन ने बेहद कम आयु में ही एक समाजसेवी, लेखक* *और कवि के रूप में पहचान स्थापित कर ली थी।*
साल 1938 में गढ़वाल जिला कांग्रेस कमेटी का राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसमें जवाहरलाल नेहरु आए। श्रीदेव सुमन ने विशेषकर टिहरी के लोगों की समस्याओं को बहुत प्रभावशाली ढंग से रखा और जवाहरलाल नेहरू से इस विषय पर उनसे अलग से भी बातचीत की।*
1939 के आरंभ में देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की गई। श्रीदेव सुमन इसकी संयोजक समिति के मंत्री चुने गए और वे बहुत उत्साह से इसके कार्य के प्रसार में लग गए। इसी वर्ष लुधियाना में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के अधिवेशन में उनकी योग्य और उत्साहवर्धक भूमिका से आकर्षित होकर परिषद् के अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें लोक परिषद की स्थायी समिति में हिमालय प्रान्तीय देशी राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में चुना।*
24 वर्ष की आयु में ही इतनी बड़ी जिम्मेदारियां सिर पर आ जाने के बाद तो श्रीदेव सुमन का जीवन बहुत व्यस्त हो गया। कभी दिल्ली दौड़े चले जा रहे हैं, तो कभी वर्धा, कभी शिमला तो कभी बम्बई। पर इन तमाम व्यस्तताओं के बीच वे कभी-कभी अपने गांव जाने का समय जरूर निकालते थे और इस तरह अपने क्षेत्र के लोगों के दुख-दर्द को नजदीक से जानने-समझने का अवसर भी प्राप्त करते थे।*
*अप्रैल 1940 में दिल्ली में श्रीदेव सुमन की अध्यक्षता में ‘गढ़वाल राज्य प्रवासी प्रजा सम्मेलन’ आयोजित हुआ। इसी समय के आसपास वे ‘कांग्रेस सत्याग्रह समिति’ की गढ़वाल उपसमिति के संयोजक भी चुने गए। उन्होंने टिहरी जाकर जनसभाएं आयोजित करने का प्रयास किया, पर पुलिस-प्रशासन ने ऐसा करने नहीं दिया। 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” आरंभ होने के बाद टिहरी जैसे देशी रियासतों के जन-आंदोलनों में भी उभार आया।*
*अगस्त महीने में बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सम्मेलन में देशी नरेशों से मांग की गई कि वे ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध विच्छेद करें और लोगों के प्रति उत्तरदायी शासन घोषित करें। वहां से लौटकर सुमन ने मसूरी में अपने साथियों से विचार विमर्श किया और टिहरी राजशाही को भी उत्तरदायी शासन स्थापित करने, बेगार और अन्यायपूर्ण कर समाप्त करने, प्रजामंडल को भली-भांति कार्य करने के अवसर प्रदान करने का मांग पत्र भेज दिया।*
*इन्हीं मांगों को आगे बढ़ाने के लिए 10 सितंबर को कार्यकर्ताओं का एक सम्मेलन टिहरी में आयोजित किया गया। किन्तु सुमन को टिहरी पंहुचने से पहले ही देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया और अनेक अन्य कार्यकर्ताओं के साथ देहरादून जेल भिजवा दिया गया। नवंबर में सुमन को अनेक अन्य साथियों सहित आगरा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया।*
*एक साल और 62 दिन की कैद के बाद, 19 नवंबर 1943 को सुमन रिहा हुए। दिसंबर में उन्होंने टिहरी रियासत में प्रवेश किया और लगभग एक सप्ताह अपने गांव जौल में गुजारा। 27 दिसंबर को वे टिहरी के लिए निकल पड़े, लेकिन चम्बा में पुलिस ने उन्हें रोक दिया।*
*यहीं से सुमन ने उच्चाधिकारियों को अपने सार्थक उद्देश्य के बारे में पत्र लिखा। 30 दिसंबर को उत्तर के दौरे पर पुलिस सुपरिंटेडैंट चंबा पंहुच गए और उन्हीें की बंद मोटर में श्रीदेव सुमन को टिहरी जेल के भीतर पंहुचा दिया गया। आगरा सेंट्रल जेल से छूटे हुए अभी उन्हें मात्र 41 दिन ही हुए थे।*
*जेल में सुमन के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्हें प्रताड़ित कर, माफीनामा लिखने को मजबूर करने की बेतहाशा कोशिशें कीं गईं। इंकार करने पर उन्हें भारी यातनाएं दी गईं, तो भी सुमन अपने पथ से तनिक न डिगे। जेल में उन्हें सबसे अलग रखा जाता और किसी से भी मिलने नहीं दिया जाता था।*
*जब सुमन की सभी लोकतांत्रिक मांगें अस्वीकृत होती गईं, तो 3 मई 1944 को उन्होंने अपना वह ऐतिहासिक अनशन आरंभ किया, जो सदा के लिए विश्व के त्याग और बलिदान के इतिहास में दर्ज हो चुका है। अनशन आरंभ होने के बाद सुमन पर अत्याचार और भी बढ़ गए। उन्हें रोज बेंतों और डंडों से पीटा जाता था और जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयास किया जाता था। जब यह सब कोशिशें सफल न हुईं तो, उन्हें जेल अस्पताल की एक कोठरी में डाल दिया गया। यहां भी उन पर शारीरिक जुल्म ढाये जाते थे।*
*सुमन की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती देखकर अधिकारियों ने उनकी बीमारी की अफवाह फैलाई. मात्र 29 वर्ष की आयु में 84 दिनों के उपवास के बाद, 25 जुलाई 1944 को टिहरी जेल में, अहिंसक संघर्ष के पुजारी सुमन का प्राणान्त हुआ।*
