सम्पादकीय
यदि आप सुख से जीवन जीना चाहते हैं, तो उसके लिए आपको व्यावहारिक रूप से लोगों के ‘टच’ में रहना पड़ेगा, अर्थात उनके ‘संपर्क’ में रहना पड़ेगा। जैसे 20-30 वर्ष पहले लोग एक दूसरे के घर जाते थे, एक दूसरे का हाल-चाल पूछते थे, परस्पर सुख-दुख बांटते थे, सेवा सहयोग करते थे, तब के लोग आज की अपेक्षा अधिक सुखी थे। क्योंकि तब लोग ‘व्यावहारिक रूप से टच’ में थे।
“आज वह परंपरा बहुत कम रह गई है। ऐसे बहुत थोड़े लोग बचे हैं, अथवा अधिकांश लोग बहुत कम मात्रा में दूसरों के यहां आना जाना मिलना जुलना बातें करना हाल-चाल पूछना सुख दुख बांटना आदि करते हैं।”
अब तो अधिकतर ‘मोबाइल से ही लोग टच’ में रहते हैं। वह भी केवल एक औपचारिकता मात्र है। *”कोई भी त्यौहार या पर्व आता है, तो लोग मोबाइल से ही अपना मैसेज फोटो वीडियो आदि भेज देते हैं। और ऐसा मान लेते हैं, कि हमने त्यौहार मना लिया। इसमें बहुत अधिक अधूरापन है।”
*”इसलिए सुखी जीवन जीने के लिए पहले की तरह ‘व्यावहारिक रूप से लोगों के टच’ में रहें। उनके यहां आना-जाना खाना-पीना बातें करना सुख-दुख बांटना बहुत आवश्यक है।” “तभी आपके जीवन में सुख बढ़ेगा तथा चिंताएं तनाव एवं दुख आदि घटेगा।
यदि आप सुख से जीवन जीना चाहते हैं, तो उसके लिए आपको व्यावहारिक रूप से लोगों के ‘टच’ में रहना पड़ेगा, अर्थात उनके ‘संपर्क’ में रहना पड़ेगा। जैसे 20-30 वर्ष पहले लोग एक दूसरे के घर जाते थे, एक दूसरे का हाल-चाल पूछते थे, परस्पर सुख-दुख बांटते थे, सेवा सहयोग करते थे, तब के लोग आज की अपेक्षा अधिक सुखी थे। क्योंकि तब लोग ‘व्यावहारिक रूप से टच’ में थे।
“आज वह परंपरा बहुत कम रह गई है। ऐसे बहुत थोड़े लोग बचे हैं, अथवा अधिकांश लोग बहुत कम मात्रा में दूसरों के यहां आना जाना मिलना जुलना बातें करना हाल-चाल पूछना सुख दुख बांटना आदि करते हैं।”
अब तो अधिकतर ‘मोबाइल से ही लोग टच’ में रहते हैं। वह भी केवल एक औपचारिकता मात्र है। *”कोई भी त्यौहार या पर्व आता है, तो लोग मोबाइल से ही अपना मैसेज फोटो वीडियो आदि भेज देते हैं। और ऐसा मान लेते हैं, कि हमने त्यौहार मना लिया। इसमें बहुत अधिक अधूरापन है।”
*”इसलिए सुखी जीवन जीने के लिए पहले की तरह ‘व्यावहारिक रूप से लोगों के टच’ में रहें। उनके यहां आना-जाना खाना-पीना बातें करना सुख-दुख बांटना बहुत आवश्यक है।” “तभी आपके जीवन में सुख बढ़ेगा तथा चिंताएं तनाव एवं दुख आदि घटेगा।
