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उत्तरकाशीउत्तराखंडफीचर्डसंस्कृति

सर्वोच्च न्यायालय का हिन्दू विवाह पर अनुकरणीय व स्वागत योग्य फैसला ।

Lokesh Badoni
Last updated: May 5, 2024 7:38 am
Lokesh Badoni Published May 5, 2024
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  सम्पादकीय

  आचार्य लोकेश बडोनी

 देश की सर्वोच्च अदालत ने हिंदू विवाह को लेकर बड़ा फैसला देखकर न केवल हिंदू विवाह के संस्कारों एवं पारंपरिक रिवाज को पुष्ट किया है बल्कि उन्हें कानूनी दृष्टि से आवश्यक स्वीकार किया है। आज जबकि हिंदू विवाह की पवित्रता एवं परंपरा तथा कथित आधुनिक जीवन एवं प्रभाव के कारण धुंधली होती जा रही है पाश्चात्य संस्कृति की आंधी में हिंदू विवाह की पवित्रता समाज में समय के साथ घटी है और इसमें सुधार एवं सुदृढ़ता की जरूरत है। जो लोग विभाग को मात्र एक पंजीकरण मानते हैं, उन्हें चेत जाना चाहिए । उन्हें सात फेरों का अर्थ समझना होगा। बिना सात फेरों हिंदू रीति रिवाज एवं वैवाहिक आयोजनों के कोर्ट की दृष्टि में भी विवाह मान्य नहीं होगा । हिंदू विवाह पर कोर्ट का ताजा फैसला न केवल स्वागत योग्य है बल्कि इसके दूरगामी परिणाम सुखद होंगे। इससे हिंदू संस्कृति एवं संस्कारों को बल मिलेगा । हिंदू विवाह से जुड़ा फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा की शादी “गाने और डांस” शराब पीने और खाने” का आयोजन या अनुचित दबाव डालकर दहेज और गिफ्ट्स की मांग करने का मौका नहीं है। यह एक गंभीर बुनियादी सांस्कृतिक एवं पारिवारिक आयोजन है जिसे एक पुरुष और एक महिला के बीच संबंध बनाने के लिए मनाया जाता है जो भविष्य में एक अच्छे परिवार के लिए पति और पत्नी का दर्जा प्राप्त करते हैं भारतीय हिंदू समाज की व्यवस्था की एक बुनियादी इकाई एवं मजबूत सांस्कृतिक पारिवारिक सामाजिक आयाम है।दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि बिना सात फेरों के हिंदू विवाह को मानता नहीं मिल सकती है अर्थात शादी के लिए हिंदू विवाह अधिनियम में जो नियम और प्रावधान बनाए गए हैं उसका पालन करना होगा इस तरह कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत हिंदू विवाह की कानूनी आवश्यकताओं और पवित्रता को स्पष्ट किया है।

 हिंदू विवाह किसी भी पक्ष के पारंपरिक संस्कारों और समारोह के अनुसार संपन्न किया जाएगा । समझ में सप्तपदी (दूल्हा और दुल्हन द्वारा पवित्र अग्नि के चारों ओर संयुक्त रूप से सात कदम उठाना) शामिल है, और जब वे सातवां चरण एक साथ लेते हैं तो विवाह पूर्ण और बाध्यकारी हो जाता है ।कुल मिलाकर हिंदू विवाह एक संस्था है, संस्कार है और विवाह कोई व्यावसायिक लेन देन नहीं है। प्रश्न यह है कि, विवाह को लेकर कोर्ट जागरूक होने हिंदू संस्कारों को मजबूती देने की जरूरत क्यों पड़ी। हिंदू विवाह से जुड़े संस्कारों एवं पारंपरिक रीति-रिवाज को लेकर अनेक मामले कोर्ट की चौखट पर आती रहे हैं हर बार कोर्ट सजगता दूरदर्शिता एवं विवेक से विवाह संस्था से जुड़े मामलों पर अपना नजरिया प्रस्तुत करती रही है। हिंदू विवाह एक आदर्श परम्परा एवं संस्कार है। हिंदू धर्म में विवाह एक १६ संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। विवाह : वि .. वाह, अतः इसका शाब्दिक अर्थ है — विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना। पानी ग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है अन्य धर्म में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का कार होता है जिसे विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है। परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जान मित्रों का संबंध होता है जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता है अग्नि के साथ फेरे लेकर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं । यह दो परिवारों का भी मिलन है हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक सम्बन्ध होता है। और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है हिंदू विवाह का न केवल पारिवारिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व है बल्कि उसकी गहन आध्यात्मिक महत्व भी है। हिंदू धर्म ने चार पुरुषार्थ (जीवन की चार बुनियादी खोज ) यानी धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष निर्धारित किया है । 

विवाह संस्कार का उद्देश्य काम के पुरुषार्थ को पूरा करना और फिर धीरे-धीरे मोक्ष की ओर बढ़ता है एक पुरुष और महिला के जीवन में कई पूर्व महत्वपूर्ण चीज शादी से जुड़ी होती है । हिंदू समाज में विवाहित महिला को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, उसके माथे पर कुमकुम सिंदूर गले में मंगलसूत्र पहने हुए हरी चूड़ियां पैर के अंगूठे के छले उसके मन में उसके लिए सम्मान उत्पन्न करता है। हिंदू विवाह के सात वचनों में से कम से कम तीन ऐसे हैं जहां जोड़े अपने बुजुर्गों की देखभाल करने का संकल्प करते हैं। पांचवा वचन अपनी संतान पैदा करने और उसकी देखभाल करने का है । हल्के वर्षों में भारत में हिंदू विवाह परंपरा एवं संस्कृति से अनेक विसंगतियां एवं विकृतियों जुड़ गई है जैसे लव-मैरिज का प्रचलन बड़ा है। दूल्हा और दुल्हन अपने दम पर जीवनसाथी चुनना पसंद करते हैं आज के रोमांटिक रिश्ते वास्तव में विवाह नहीं है बल्कि एक नई प्रथा है इसके विपरीत प्रभाव से परिवार संस्था बिखरने लगी है विवाह के साथ प्री वेडिंग का भी प्रचलन भी अनेक विकृतियों का वाहक बना है बड़े-बड़े भव्य आयोजनों एवं होटल संस्कृति ने विवाह की पवित्रता को धुंधलाया है। आयोजनों में शराब मांस नशे आदि का प्रचलन बढ़ते जा रहा है और दुर्घटनाओं की सम्भावना बनी है ,इसी कारण विवाह होने से पहले उसमें दरारें पड़ती हुई देखी गई है, सभी से आग्रह करते हैं, विवाह की पवित्रता परम्पराओं को बनाया रखने हेतु सनातन धर्म संस्कृति को संरक्षित रखने हेतु पाश्चात्य संस्कृति को न अपनाते हुए, हिन्दू संस्कृति का अनुशरण करते हुए चारों पुरुषार्थों को सार्थक करें।

 सत्य सनातन धर्म की जय

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