आचार्य लोकेश बडोनी मधुर यमुना घाटी पुरोला उतरकाशी
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन आज भी गंभीर चुनौती बना हुआ है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और बेहतर जीवन की तलाश में बड़ी संख्या में लोग गांव छोड़कर शहरों और मैदानी क्षेत्रों का रुख कर रहे हैं। पलायन निवारण आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2011 से 2022 के बीच करीब 1.38 लाख लोगों ने स्थायी रूप से गांव छोड़े, जबकि लगभग 6.9 लाख लोगों का अस्थायी पलायन दर्ज किया गया।
इसका सबसे गंभीर असर पहाड़ के गांवों पर पड़ा है। करीब 758 गांव वर्तमान में निर्जन बताए गए हैं, जिनमें टिहरी पौड़ी समेत कई पर्वतीय जिलों में स्थिति चिंताजनक है। गांवों से युवाओं के जाने के साथ खेती की जमीन बंजर हो रही है और पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। अगस्त 2025 तक 6,282 लोग वापस अपने गांव लौटे, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। लौटने वाले लोग कृषि, पर्यटन और स्वरोजगार से जुड़कर गांवों में नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं।
उत्तराखंड के लिए असली चुनौती अब सिर्फ पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में ऐसा रोजगार और बुनियादी ढांचा तैयार करना है, जिससे पहाड़ का युवा अपने गांव में रहकर सम्मानजनक जीवन और स्थायी आय हासिल कर सके। तभी वीरान होते गांवों में फिर से जीवन लौट सकेगा। सरकार पर्वतीय जिलों में पलायन रोकने के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।
कृषि, बागवानी, पशुपालन और जैविक खेती को बढ़ावा मिले।
होम-स्टे और ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहन दिया जाए।
बंद पड़ी जमीनों पर सामूहिक खेती और स्थानीय उद्योग पहाड़ी उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित की जाए।
गांव लौटने वाले लोगों को आर्थिक सहायता और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिले।
इसका सबसे गंभीर असर पहाड़ के गांवों पर पड़ा है। करीब 758 गांव वर्तमान में निर्जन बताए गए हैं, जिनमें टिहरी पौड़ी समेत कई पर्वतीय जिलों में स्थिति चिंताजनक है। गांवों से युवाओं के जाने के साथ खेती की जमीन बंजर हो रही है और पारंपरिक ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ रही है
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। अगस्त 2025 तक 6,282 लोग वापस अपने गांव लौटे, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। लौटने वाले लोग कृषि, पर्यटन और स्वरोजगार से जुड़कर गांवों में नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं।
उत्तराखंड के लिए असली चुनौती अब सिर्फ पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में ऐसा रोजगार और बुनियादी ढांचा तैयार करना है, जिससे पहाड़ का युवा अपने गांव में रहकर सम्मानजनक जीवन और स्थायी आय हासिल कर सके। तभी वीरान होते गांवों में फिर से जीवन लौट सकेगा। सरकार पर्वतीय जिलों में पलायन रोकने के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।
कृषि, बागवानी, पशुपालन और जैविक खेती को बढ़ावा मिले।
होम-स्टे और ग्रामीण पर्यटन को प्रोत्साहन दिया जाए।
बंद पड़ी जमीनों पर सामूहिक खेती और स्थानीय उद्योग पहाड़ी उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित की जाए।
गांव लौटने वाले लोगों को आर्थिक सहायता और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिले।
