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उत्तराखंडदेहरादूनसामाजिक

नये क्षितिज – नये आयाम” — संघ के शताब्दी वर्ष पर देहरादून में भव्य जन गोष्ठी सम्पन्न !

Lokesh Badoni
Last updated: February 23, 2026 12:36 am
Lokesh Badoni Published February 23, 2026
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“नये क्षितिज – नये आयाम” — संघ के शताब्दी वर्ष पर देहरादून में भव्य जन गोष्ठी सम्पन्न !

देहरादून

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की गौरवशाली संघ यात्रा के उपलक्ष्य में आज हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र ऑडिटोरियम, गढ़ी कैंट, देहरादून में “नये क्षितिज – नये आयाम” विषयक प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद कार्यक्रम का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों के प्रबुद्धजन, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, युवा वर्ग तथा संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण से हुआ, तत्पश्चात् सभागार में उपस्थित समस्त जनसमूह ने सामूहिक वंदे मातरम् का गायन कर वातावरण को राष्ट्रभक्ति के भाव से अनुप्राणित किया। इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों में प्रांत संघचालक श्री बहादुर सिंह बिष्ट जी एवं क्षेत्र संघचालक श्री सूर्य प्रकाश टोंक जी की गरिमामय उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष महत्त्व प्रदान किया।

कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन विभाग प्रचार प्रमुख श्री गजेंद्र खंडूरी जी ने किया।

प्रारंभिक संबोधन में प्रांत कार्यवाह श्री दिनेश सेमवाल जी ने उपस्थित सभागार को शताब्दी वर्ष में उत्तराखंड में सम्पन्न हुई विविध गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष में विजयादशमी से प्रारंभ होकर पथ संचालन, घोष संचालन, व्यापक गृह संपर्क, परिवारों में प्रत्यक्ष संपर्क और हिंदू सम्मेलन जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न हुए हैं तथा आगामी समय में और भी अनेक कार्यक्रम नियोजित हैं जो समाज को संगठित एवं जागरूक करने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होंगे।

सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी ने अपने ओजस्वी एवं विचारप्रवाही संबोधन में संघ के वास्तविक स्वरूप को अत्यंत सरल और हृदयग्राही शब्दों में जनमानस के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि बाहर से संघ का वास्तविक परिचय नहीं मिलता — पथ संचालन देखकर अर्धसैनिक बल का भ्रम होता है, राष्ट्र प्रेम के गीत सुनकर संगीत समूह का आभास होता है और सेवा के कार्य देखकर किसी सेवा संस्था जैसा लगता है, परंतु संघ इन सबसे सर्वथा भिन्न और अनूठा संगठन है। उन्होंने बड़े ही सटीक एवं सहज उदाहरण से कहा कि “जैसे चीनी खाकर ही चीनी की मिठास का अनुभव होता है, उसी प्रकार संघ में आकर ही संघ को समझा जा सकता है।”

राष्ट्र की शक्ति और व्यक्ति के सामर्थ्य के गहरे अन्योन्याश्रित संबंध को रेखांकित करते हुए भागवत जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्र शक्तिशाली होता है तो राष्ट्रवासी शक्तिशाली होते हैं, और यदि राष्ट्र शक्तिशाली नहीं तो व्यक्ति अपने देश में भी सुरक्षित नहीं रह सकता। इसीलिए राष्ट्र निर्माण प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व है।

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“नये क्षितिज – नये आयाम” — संघ के शताब्दी वर्ष पर देहरादून में भव्य जन गोष्ठी सम्पन्न !देहरादूनराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की गौरवशाली संघ यात्रा के उपलक्ष्य में आज हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र ऑडिटोरियम, गढ़ी कैंट, देहरादून में “नये क्षितिज – नये आयाम” विषयक प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद कार्यक्रम का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर समाज के विभिन्न वर्गों के प्रबुद्धजन, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, युवा वर्ग तथा संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण से हुआ, तत्पश्चात् सभागार में उपस्थित समस्त जनसमूह ने सामूहिक वंदे मातरम् का गायन कर वातावरण को राष्ट्रभक्ति के भाव से अनुप्राणित किया। इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों में प्रांत संघचालक श्री बहादुर सिंह बिष्ट जी एवं क्षेत्र संघचालक श्री सूर्य प्रकाश टोंक जी की गरिमामय उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष महत्त्व प्रदान किया।कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन विभाग प्रचार प्रमुख श्री गजेंद्र खंडूरी जी ने किया।प्रारंभिक संबोधन में प्रांत कार्यवाह श्री दिनेश सेमवाल जी ने उपस्थित सभागार को शताब्दी वर्ष में उत्तराखंड में सम्पन्न हुई विविध गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष में विजयादशमी से प्रारंभ होकर पथ संचालन, घोष संचालन, व्यापक गृह संपर्क, परिवारों में प्रत्यक्ष संपर्क और हिंदू सम्मेलन जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न हुए हैं तथा आगामी समय में और भी अनेक कार्यक्रम नियोजित हैं जो समाज को संगठित एवं जागरूक करने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होंगे।सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी ने अपने ओजस्वी एवं विचारप्रवाही संबोधन में संघ के वास्तविक स्वरूप को अत्यंत सरल और हृदयग्राही शब्दों में जनमानस के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि बाहर से संघ का वास्तविक परिचय नहीं मिलता — पथ संचालन देखकर अर्धसैनिक बल का भ्रम होता है, राष्ट्र प्रेम के गीत सुनकर संगीत समूह का आभास होता है और सेवा के कार्य देखकर किसी सेवा संस्था जैसा लगता है, परंतु संघ इन सबसे सर्वथा भिन्न और अनूठा संगठन है। उन्होंने बड़े ही सटीक एवं सहज उदाहरण से कहा कि “जैसे चीनी खाकर ही चीनी की मिठास का अनुभव होता है, उसी प्रकार संघ में आकर ही संघ को समझा जा सकता है।”राष्ट्र की शक्ति और व्यक्ति के सामर्थ्य के गहरे अन्योन्याश्रित संबंध को रेखांकित करते हुए भागवत जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्र शक्तिशाली होता है तो राष्ट्रवासी शक्तिशाली होते हैं, और यदि राष्ट्र शक्तिशाली नहीं तो व्यक्ति अपने देश में भी सुरक्षित नहीं रह सकता। इसीलिए राष्ट्र निर्माण प्रत्येक नागरिक का परम दायित्व है।संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के अद्वितीय व्यक्तित्व एवं जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए भागवत जी ने बताया कि वे जन्मजात देशभक्त और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बाल्यकाल में ही उन्होंने महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर विद्यालय में मिठाई लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वे अपने देश पर शासन करने वाले के जन्मदिवस का उत्सव मनाना उचित नहीं समझते थे। हेडगेवार जी अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य रहे और वंदे मातरम् के गायन के कारण अंग्रेजों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा भी चलाया, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी अटल मान्यता थी कि हमारा देश अनेक बार परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा और स्वतंत्रता के पश्चात् फिर कभी ऐसी स्थिति न आए — इसी दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने जागरूक व्यक्ति और सजग समाज के निर्माण हेतु संघ की स्थापना की।भागवत जी ने कहा कि 2000 वर्षों की दीर्घ यात्रा के बाद आज समस्त विश्व भारत को विश्वगुरु के रूप में नेतृत्व प्रदान करने के लिए आशा की दृष्टि से देख रहा है। यह भारत के सनातन ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। उन्होंने संघ के पंच परिवर्तन के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उपस्थित सभी जनों से भारत को परम वैभव की ओर ले जाने का संकल्प लेने तथा संघ एवं उसकी गतिविधियों से जुड़कर समाज और देश को सशक्त बनाने का आह्वान किया।द्वितीय सत्र में भागवत जी ने सभागार में उपस्थित समाज के विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों के प्रबुद्धजनों तथा युवाओं के जिज्ञासा सत्र को संबोधित किया। विभिन्न क्षेत्रों से आए जिज्ञासुओं ने संघ के स्वरूप, कार्यशैली एवं राष्ट्र निर्माण में भूमिका से संबंधित अनेक प्रश्न रखे, जिनका भागवत जी ने अत्यंत संतोषजनक, तार्किक एवं सहज भाव से उत्तर दिया। यह सत्र उपस्थित जनों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी रहा।आज के इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों में अखिल भारतीय सेवा प्रमुख श्री राजकुमार जी, क्षेत्र कार्यवाह श्री प्रमोद जी, क्षेत्र प्रचारक श्री महेंद्र जी, प्रचारक प्रमुख श्री जगदीश जी, क्षेत्र प्रचार प्रमुख श्री पद्म जी, क्षेत्र सेवा प्रमुख श्री धनीराम जी, प्रांत प्रचारक डॉ. शैलेंद्र जी, सह प्रांत प्रचारक श्री चंद्रशेखर जी तथा सहित समाज के सभी वर्गों के गणमान्य प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत के भावपूर्ण एवं ओजस्वी गायन तथा जलपान के साथ हुआ।

संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी के अद्वितीय व्यक्तित्व एवं जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हुए भागवत जी ने बताया कि वे जन्मजात देशभक्त और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बाल्यकाल में ही उन्होंने महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर विद्यालय में मिठाई लेने से इनकार कर दिया था, क्योंकि वे अपने देश पर शासन करने वाले के जन्मदिवस का उत्सव मनाना उचित नहीं समझते थे। हेडगेवार जी अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य रहे और वंदे मातरम् के गायन के कारण अंग्रेजों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा भी चलाया, किंतु वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उनकी अटल मान्यता थी कि हमारा देश अनेक बार परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा और स्वतंत्रता के पश्चात् फिर कभी ऐसी स्थिति न आए — इसी दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने जागरूक व्यक्ति और सजग समाज के निर्माण हेतु संघ की स्थापना की।

भागवत जी ने कहा कि 2000 वर्षों की दीर्घ यात्रा के बाद आज समस्त विश्व भारत को विश्वगुरु के रूप में नेतृत्व प्रदान करने के लिए आशा की दृष्टि से देख रहा है। यह भारत के सनातन ज्ञान, संस्कृति और जीवन मूल्यों की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है। उन्होंने संघ के पंच परिवर्तन के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए उपस्थित सभी जनों से भारत को परम वैभव की ओर ले जाने का संकल्प लेने तथा संघ एवं उसकी गतिविधियों से जुड़कर समाज और देश को सशक्त बनाने का आह्वान किया।

द्वितीय सत्र में भागवत जी ने सभागार में उपस्थित समाज के विभिन्न धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों के प्रबुद्धजनों तथा युवाओं के जिज्ञासा सत्र को संबोधित किया। विभिन्न क्षेत्रों से आए जिज्ञासुओं ने संघ के स्वरूप, कार्यशैली एवं राष्ट्र निर्माण में भूमिका से संबंधित अनेक प्रश्न रखे, जिनका भागवत जी ने अत्यंत संतोषजनक, तार्किक एवं सहज भाव से उत्तर दिया। यह सत्र उपस्थित जनों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी रहा।

आज के इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों में अखिल भारतीय सेवा प्रमुख श्री राजकुमार जी, क्षेत्र कार्यवाह श्री प्रमोद जी, क्षेत्र प्रचारक श्री महेंद्र जी, प्रचारक प्रमुख श्री जगदीश जी, क्षेत्र प्रचार प्रमुख श्री पद्म जी, क्षेत्र सेवा प्रमुख श्री धनीराम जी, प्रांत प्रचारक डॉ. शैलेंद्र जी, सह प्रांत प्रचारक श्री चंद्रशेखर जी तथा सहित समाज के सभी वर्गों के गणमान्य प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत के भावपूर्ण एवं ओजस्वी गायन तथा जलपान के साथ हुआ।

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