सम्पादकीय
मकर संक्रांति पर्व की समस्त देशवासियों को बहुत बहुत मंगलमयी शुभकामनाएं
मकर संक्रांति सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और शुभ पर्व है, जो प्रकृति, सूर्य उपासना और मानव जीवन के बीच संतुलन को प्रदर्शित करता है। यह त्यौहार भारत के विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, गुजरात और महाराष्ट्र में उत्तरायण, तमिलनाडु में पोंगल तथा असम में माघ बिहू के नाम से जाना जाता है। नाम चाहे अलग हों, लेकिन इस पर्व का मूल भाव एक ही है, और वह है; सूर्य देव की उपासना और दान-पुण्य करना।
यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण हो ते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
हर साल 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार सर्दियों के अंत और वसंत ऋतु के आरंभ का प्रतीक है और इसलिए इसका सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और भौगोलिक महत्व है
शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। और महाभारत काल के दौरान मकर संक्रांति का एक गहरा संबंध भीष्म पितामह से माना जाता है। भीष्म पितामह को अपनी इच्छा के अनुसार मृत्यु का वरदान प्राप्त था। जब वे बाणों की शय्या पर लेटे थे, तब सूर्य ‘दक्षिणायन’ (अंधकार का समय) में थे। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि दक्षिणायन में शरीर त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता। तथा मकर संक्रांति पर सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं, इसलिए इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल की खिचड़ी बनाई जाती है। इसे शुभता का प्रतीक माना जाता है।इस दिन दीन-दुःखी, असहाय और जरूरतमंदों की सेवा करने से भगवान सूर्य अत्यंत प्रसन्न होते हैं। अन्न और भोजन का दान : इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस पर्व का वैज्ञानिक कारण यह भी है कि इस दिन से सूर्य के उत्तरायण हो जाने से प्रकृति में बदलाव शुरू हो जाता है. शीत के कारण से ठिठुरते लोगों को भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से शीत ऋतु से राहत मिलना आरंभ होता है। और इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना मां अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना गया है।
यह वह क्षण होता है, जब सूर्य उत्तरायण हो ते हैं और खरमास के बाद शुभ काल आरंभ होता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय आत्मशुद्धि और पुण्य अर्जन के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
हर साल 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार सर्दियों के अंत और वसंत ऋतु के आरंभ का प्रतीक है और इसलिए इसका सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और भौगोलिक महत्व है
शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। और महाभारत काल के दौरान मकर संक्रांति का एक गहरा संबंध भीष्म पितामह से माना जाता है। भीष्म पितामह को अपनी इच्छा के अनुसार मृत्यु का वरदान प्राप्त था। जब वे बाणों की शय्या पर लेटे थे, तब सूर्य ‘दक्षिणायन’ (अंधकार का समय) में थे। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि दक्षिणायन में शरीर त्यागने पर मोक्ष नहीं मिलता। तथा मकर संक्रांति पर सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं, इसलिए इस दिन शनि देव को प्रसन्न करने के लिए उड़द दाल की खिचड़ी बनाई जाती है। इसे शुभता का प्रतीक माना जाता है।इस दिन दीन-दुःखी, असहाय और जरूरतमंदों की सेवा करने से भगवान सूर्य अत्यंत प्रसन्न होते हैं। अन्न और भोजन का दान : इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस पर्व का वैज्ञानिक कारण यह भी है कि इस दिन से सूर्य के उत्तरायण हो जाने से प्रकृति में बदलाव शुरू हो जाता है. शीत के कारण से ठिठुरते लोगों को भगवान सूर्य के उत्तरायण होने से शीत ऋतु से राहत मिलना आरंभ होता है। और इस दिन अन्नदान का विशेष महत्व है। खिचड़ी का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ ही तिल और गुड़ का दान करने से धन, यश और मान-सम्मान में वृद्धि होती है। इस दिन किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना मां अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त करने का उत्तम माध्यम माना गया है।
