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उत्तराखंडदेहरादून

जल जीवन मिशन कार्यालय पर ठेकेदारों ने जड़ा ताला

Lokesh Badoni
Last updated: January 12, 2026 2:34 pm
Lokesh Badoni Published January 12, 2026
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प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट जल जीवन मिशन मे ठेकेदारों की धन की मांग।

ठेकेदारों ने मिशन डायरेक्टर (आईएएस) विशाल मिश्रा को दिया ज्ञापन।

देहरादून: देवभूमि जल शक्ति कांट्रेक्टर वेलफेयर एसोसिएशन, देहरादून की ओर से जल जीवन मिशन कार्यालय इंदर रोड में धरना प्रदर्शन किया एवं ठेकेदारों ने जल जीवन मिशन कार्यालय में ताला जड़ दिया एवं अपनी बात रखी। इस धरणा का मुख्य उद्देश्य जल जीवन मिशन से जुड़े हुए ठेकेदारों के भुगतान में हो रही देरी एवं उनके ऊपर विभागों द्वारा अत्याचार, ग्राम प्रधानों द्वारा योजना को वेरिफाई कराने से संबंधित रहा। वहीं ठेकेदारों ने मिशन डायरेक्टर (आईएएस) विशाल मिश्रा को ज्ञापन दिया। इस धारणा में जेपी अग्रवाल, ध्रुव जोशी, यशपाल चौहान, सुनील गुप्ता, सचिन मित्तल, अंकित सालार, जगजीत सिंह एवं पीड़ित ठेकेदारों का समूह भी शामिल रहे।

ज्ञापन: यह सर्वविदित है कि उत्तराखंड राज्य में माननीय प्रधानमंत्री जी के महत्वाकांक्षी ड्रीम प्रोजेक्ट जल जीवन मिशन को धरातल पर उतारने हेतु राज्य के ठेकेदारों ने अपनी निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक तन, मन एवं धन लगाकर अत्यंत जिम्मेदारी एवं निष्ठा के साथ कार्य किया है। परंतु अत्यंत खेद के साथ अवगत कराना पड़ रहा है कि ठेकेदारों को समय-समय पर यह आश्वासन दिया गया कि जियो-टैगिंग पूर्ण होने के पश्चात भुगतान किया जाएगा। तत्पश्चात यह कहा गया कि के.एम.एल. फाइल तैयार होने पर धनराशि आवंटित होगी। अब यह सूचित किया जा रहा है कि Unique ID (Mapping पूर्ण होने के बाद) बनने पर ही भुगतान संभव होगा।  इस प्रकार ठेकेदारों को विगत दो वर्षों से भुगतान नहीं किया गया है, जिससे सरकार की मंशा स्पष्ट प्रतीत नहीं हो रही है। ऐसी परिस्थितियों में ठेकेदार गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।

यह अवगत कराना आवश्यक हो गया है कि योजनाओं की निर्धारित समय-सीमा समाप्त हो जाने के उपरांत भी ठेकेदारों को उनका रखरखाव एवं संचालन जारी रखने के लिए बाध्य किया जा रहा है। वर्तमान में योजनाओं की मॉनिटरिंग भी ठेकेदारों द्वारा ही करवाई जा रही है।जिन स्थानों पर अभी तक जलापूर्ति प्रारंभ नहीं हो पाई है, वहां स्थानीय जनता द्वारा कनेक्शन उखाड़ दिए गए हैं। इसके बावजूद ठेकेदारों से योजनाओं का संचालन जारी रखने की अपेक्षा की जा रही है।योजनाओं के निरंतर संचालन के बावजूद फाइनल बिल, एक्स्ट्रा आइटम, वेरिएशन आदि तैयार नहीं किए जा रहे हैं, जिसके कारण योजनाओं की एफसीआर स्वीकृत नहीं हो पा रही है।ठेकेदारों को भुगतान प्रक्रिया के स्थान पर किसी न किसी जांच, आईडी निर्माण अथवा फाइल तैयार करने जैसी प्रक्रियाओं में अनावश्यक रूप से उलझाकर रखा जा रहा है, जो कि उचित एवं न्यायसंगत नहीं है।

महोदय जल जीवन मिशन के अंतर्गत अधिकारियों एवं शासन की कार्यप्रणाली के कारण ठेकेदारों को ऐसी स्थिति में डाल दिया गया है कि वे बैंक ब्याज के अत्यधिक भार के चलते दिवालियापन की कगार पर पहुँच चुके हैं। यह स्थिति अत्यंत गंभीर एवं चिंताजनक है। जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश में हाल ही में धन आवंटन किया गया है तथा केरल में 100% भुगतान किसी वैकल्पिक योजना के माध्यम से किया जा चुका है, वहीं उत्तराखंड में इस प्रकार की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती—यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड में कई जाँच एजेंसियाँ अपने-अपने स्तर पर जाँच कर चुकी हैं। इसके बावजूद, प्रदेश में कार्य उच्च गुणवत्ता के साथ किए गए हैं। जो कार्य शेष हैं, वे ठेकेदारों की लापरवाही के कारण नहीं, बल्कि वन भूमि, राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) एवं अन्य हाईवे संबंधी आपत्तियों के कारण बाधित हैं।अतः निवेदन है कि परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए उत्तराखंड में भी वैकल्पिक व्यवस्था के माध्यम से शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया जाए, ताकि ठेकेदारों को अनावश्यक आर्थिक संकट से राहत मिल सके और योजना के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।

उत्तराखंड में किए गए समस्त कार्य जल निगम एवं जल संस्थान की देखरेख में संपादित हुए हैं, जिनकी गुणवत्ता की जांच थर्ड पार्टी एजेंसी द्वारा भी की गई है। ऐसी स्थिति में गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न कैसे लगाया जा सकता है? यदि इसके बावजूद किसी योजना में गुणवत्तापूर्ण कार्य नहीं हुआ है, तो उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी केवल ठेकेदार पर ही क्यों डाली जा रही है? यह भी विचारणीय है कि कार्य के दौरान संबंधित पेयजल निगम एवं जल संस्थान के अभियंता अपनी पर्यवेक्षणीय भूमिका में कहाँ थे।

क्या संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के लिए उनकी तनख्वाह रोकी गई है अथवा उनके विरुद्ध कोई विभागीय कार्रवाई की गई है?यदि ठेकेदारों ने मनमाने ढंग से नियमों के विपरीत कार्य किया है, तो फिर उनके साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध भी प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं कराई गई?इस विषय में निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच आवश्यक है, जिससे वास्तविक दोषियों की जिम्मेदारी तय की जा सके।

महोदय हम आपके संज्ञान में यह तथ्य लाना चाहते हैं कि जहाँ कार्य में त्रुटियाँ पाई गई हैं, वहाँ भुगतान रोका जाना समझ से परे नहीं है, परंतु जिन कार्यों में कोई आपत्ति नहीं है, उनके भुगतान को रोके जाने का कोई औचित्य नहीं बनता। इस विषय में हमारी एसोसिएशन द्वारा पूर्व में भी लगभग 12–13 बार पत्राचार के माध्यम से आपको अवगत कराया जा चुका है, किंतु अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। हम उत्तराखंड सरकार एवं सभी उच्चाधिकारियों से विनम्र अनुरोध करते हैं कि वे प्राथमिकता के आधार पर ठेकेदारों की लंबित बकाया राशि का भुगतान सुनिश्चित करें तथा ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किए जाने एवं जमा धनराशि की जब्ती जैसी कार्रवाइयों पर तत्काल रोक लगाई जाए।

महोदय, आपसे विनम्र निवेदन है कि हमारे आज के धरने को केवल एक विरोध प्रदर्शन के रूप में न देखते हुए, इससे जुड़े श्रमिक परिवारों एवं सप्लायरों के परिवारों की गंभीर समस्याओं को संवेदनशीलता एवं गहनता से समझते हुए इसकी समीक्षा करें। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न न हों कि ठेकेदार आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर पहुँच जाएँ और कोई दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठाने को विवश हों। यदि ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन एवं संबंधित अधिकारियों की होगी।साथ ही, हम आपको यह भी सूचित करना चाहते हैं कि आज के धरने के उपरांत ठेकेदार आगे किसी भी प्रकार का कार्य नहीं करेंगे। परिणामस्वरूप यदि योजनाओं में देरी होती है अथवा कार्यस्थल पर किसी प्रकार की क्षति होती है, तो उसकी पूर्ण जिम्मेदारी शासन एवं संबंधित विभाग की होगी।

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