जहां चंद्रमां को मिली थी कुष्ठ रोग से
मुक्ति
चंद्र कल्याणी राकेश्वरी देवी का मंदिर है रांसी गांव में
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जहां चंद्रमां को मिली थी कुष्ठ रोग सेमुक्तिचंद्र कल्याणी राकेश्वरी देवी का मंदिर है रांसी गांव मेंडॉ बृजेश सतीउत्तराखंड में कई ऐसे तीर्थ स्थल और देव स्थान हैं, जो न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। बल्कि मानसिक शांति देने के साथ ही रोग मुक्ति के केंद्र भी हैं।ऐसा ही एक दिव्य स्थल है, राकेश्वरी मंदिर। यह पौराणिक और धार्मिक महत्व का मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद मुख्यालय से 60 किलोमीटर की दूरी पर मध्यमेश्वर धाम के मुख्य आधार स्थल रांसी गांव में है। इस मंदिर की विशेषता है कि इस स्थान पर चंद्रमा को बृहस्पति के श्राप से मुक्ति मिली थी। यहां कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति यदि पूर्णिमा के दिन मंदिर परिसर की प्राकृतिक और दिव्य औषधियां से भरपूर घास का सेवन करे, तो वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है।रांसी गांव देश के एकमात्र राकेश्वरी देवी मंदिर के कारण श्रद्धालुओं और आस्थावानों के लिए विशेष पहचान रखता है। यह मध्यमहेश्वर घाटी के ग्रामीणों की आराध्य देवी हैं। राकेश्वरी को गढ़वाल राजाओं की कुलदेवी भी माना जाता है। यह चंद्र कल्याणी भगवती राकेश्वरी की तपस्थली है।ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर चंद्रमां को देवताओं के गुरु बृहस्पति के श्राप से मुक्ति मिली थी। दरअसल चंद्रमां, बृहस्पति के श्राप से श्रापित हो गए थे। जिससे चन्द्रमा का शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। चन्द्रमां इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के पास गये। भगवान शिव ने उनको हिमालय इस स्थान पर जाने को कहा। यहां पर चन्द्रमा ने कई वर्षों तक देवी की स्तुति की। देवी ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को दर्शन दिए। देवी के दर्शन से चन्द्रमां रोग मुक्त हो गए।केदारनाथ और मध्य महेश्वर के वरिष्ठ पुजारी शिव शंकर लिंग बताते हैं कि इस स्थान पर चंद्रमा ने मां जगदंबा का कई सालों तक तप और ध्यान किया। यहां से प्रेरणा लेकर वो सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए गए।राकेश्वरी मंदिर परिसर में एक औषधीय गुणों से भरपूर और देवी शक्ति से परिपूर्ण प्राकृतिक घास है। इस घास को ना तो कोई काटता है और ना इसमें हथियार लगाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस घास में औषधीय तत्व हैं। जिससे रोगी का कुष्ठ रोग दूर हो जाता है।जनश्रुति है कि पूर्णिमा के दिन यदि कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति गाय की तरह इस घास को चबा चबा कर खाए तो वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है। पुजारी शिव शंकर लिंग बताते हैं कि जब मध्यमहेश्वर मंदिर के कपाट ग्रीष्म काल के लिए खुलते और शीतकाल के लिए बंद होते हैं। उस दिन राकेश्वरी मंदिर में मध्यमहेश्वर और राकेश्वरी देवी दोनों की एक साथ पूजा की जाती है। यह पूजा मध्यमहेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा की जाती है। यह क्षेत्र मुक्ति प्रदान करने वाला है। इसलिए रांसी स्थित मंदिर में राकेश्वरी देवी के दर्शन का अपना अलग महत्व है।राकेश्वरी मंदिर पत्थरों के चबूतरे पर तरासे हुए पाषाण खण्डों से बना है। मंदिर दो भागों में बना है। सभा मण्डप और गर्भगृह। गर्भगृह में काले पत्थर पर भगवान शिव व पार्वती की मूर्ति उकेरी गई है। मंदिर में अष्टधातु की चार मूर्तियां हैं। इन चारों मूर्तियों की अलग-अलग रूपों में पृथक-पृथक पूजायें की जाती हैं। मंदिर के गर्भगृह में देववृक्ष से निर्मित काष्ठ पर मूर्तियों को सजाकर रखा गया है।
डॉ बृजेश सती
उत्तराखंड में कई ऐसे तीर्थ स्थल और देव स्थान हैं, जो न केवल आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करते हैं। बल्कि मानसिक शांति देने के साथ ही रोग मुक्ति के केंद्र भी हैं।
ऐसा ही एक दिव्य स्थल है, राकेश्वरी मंदिर। यह पौराणिक और धार्मिक महत्व का मंदिर रुद्रप्रयाग जनपद मुख्यालय से 60 किलोमीटर की दूरी पर मध्यमेश्वर धाम के मुख्य आधार स्थल रांसी गांव में है। इस मंदिर की विशेषता है कि इस स्थान पर चंद्रमा को बृहस्पति के श्राप से मुक्ति मिली थी। यहां कुष्ठ रोग से ग्रसित व्यक्ति यदि पूर्णिमा के दिन मंदिर परिसर की प्राकृतिक और दिव्य औषधियां से भरपूर घास का सेवन करे, तो वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाता है।
रांसी गांव देश के एकमात्र राकेश्वरी देवी मंदिर के कारण श्रद्धालुओं और आस्थावानों के लिए विशेष पहचान रखता है। यह मध्यमहेश्वर घाटी के ग्रामीणों की आराध्य देवी हैं। राकेश्वरी को गढ़वाल राजाओं की कुलदेवी भी माना जाता है। यह चंद्र कल्याणी भगवती राकेश्वरी की तपस्थली है।
ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर चंद्रमां को देवताओं के गुरु बृहस्पति के श्राप से मुक्ति मिली थी। दरअसल चंद्रमां, बृहस्पति के श्राप से श्रापित हो गए थे। जिससे चन्द्रमा का शरीर कुष्ठ रोग से ग्रस्त हो गया। चन्द्रमां इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव के पास गये। भगवान शिव ने उनको हिमालय इस स्थान पर जाने को कहा। यहां पर चन्द्रमा ने कई वर्षों तक देवी की स्तुति की। देवी ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा को दर्शन दिए। देवी के दर्शन से चन्द्रमां रोग मुक्त हो गए।
केदारनाथ और मध्य महेश्वर के वरिष्ठ पुजारी शिव शंकर लिंग बताते हैं कि इस स्थान पर चंद्रमा ने मां जगदंबा का कई सालों तक तप और ध्यान किया। यहां से प्रेरणा लेकर वो सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए गए।

