शोकरूपी सागर में डूबा हुआ जो मनुष्य है। उसे शोक सागर से निकालकर आनंद के समुद्र में पहुंचाने की ताकत केवल परमात्मा की हंसी में है ।कृष्ण के चरित्र में जितने संकट आए हैं। हंसते हुए भगवान के चिंतन की बात क्यों कही । जितने भी परमात्मा के चरित्र हैं उसमें कृष्ण के चरित्र में जितना संकट आया उतना संकट कभी किसी भगवान के जीवन में नहीं आया। श्री कृष्ण के चरित्र में एक नजर डालकर देखें ।इनका जन्म कहां हुआ जहां डाकुओं को बंद किया जाता है। जेल खाने में , जन्म लेते ही गोकुल भागना पड़ा, केवल सात दिन के थे , पूतना मारने आ गई ।जब छ महीने के थे ।तो शकटासूर मारने आया ।करने आ गया एक वर्ष के थे तृणावर्त मारने आया । उसके बाद यमुना में कूद पड़े फिर कालियानाग का दमन किया ।उसके बाद गिरिराज उठाया इस प्रकार से 11 वर्ष 56 दिन के कृष्ण ने सैकड़ो राक्षसों से युद्ध किया कंस का उद्धार किया । मथुरा में शांति नहीं मिली तो जरासंध ने मथुरा को घेर लिया।रण छोड़कर भाग लिये । शांन्ति से बैठे थे। तो घर में ही झगड़ा शुरू हो गया यदुवंशी एक दूसरे पर वार करने लगे। झगड़ने लगे। घर में भी शांति नहीं मिली ।एक भी दिन कृष्ण का सुख और शांति से व्यतीत नहीं हुआ ।लेकिन प्रभु कभी सिर पर हाथ धर कर चिंता करने बैठे। ऐसा किसी शास्त्र में नहीं लिखा । भगवान सदैव मुस्कराते रहे। भगवान कभी चिंता करने के लिए उद्यत हुए ऐसा कहीं नहीं लिखा । मुस्कुराते ही रहते हमेशा , इसका मतलब क्या है। भगवान कहते हैं अहर्निस मुस्कुराओं ।
इसलिए हमेशा जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति आ जाए।सुख-दुख, हानि लाभ ,जीवन मरण अप यश सब प्रभु के आधीन है इसलिए सदैव प्रसन्न रहना प्रभु की सर्वोपरि भक्ति है पूज्य आचार्य श्री ने भगवान की बाल लीलाओं व कर्दम देवहूति, सूर्यवंश,चंद्रवंश के राजाओं व, भगवान की वृन्दावन लीलाओं की पावन कथा सुनाई। आचार्य श्री ने कहा भारत राष्ट्र ही संपूर्ण मानवता का अभय निकेतन है। यही वह शरण स्थली है।जो दुनिया को सुख शांति समृद्धि और मानवता निर्भय और निश्चित हो सकती है। सनातन धर्म से ही दुनियां में सुख शान्ति समृद्धि व मानवता का विकास सम्भव है
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